खबरदार …………(कविता)

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सत्य और अहिंसा की सलीब पर
रोज़ चढ़ाओ गांधी को
किसे चिंता है?
अब गांधी मजबूरी भी कहाँ रहे?
नेहरू की खामियां
दिनों दिन ज़्यादा दीखने लगी हैं
पहले प्रधानमंत्री वाला इतिहास
जनप्रिय प्रधानमंत्री का तमगा
कब किसी कूड़े के सुपुर्द हो
दिन गिनते जाइये।
मार्क्स की धज्जियां जी खोल उड़ाओ
इतनी कि ‘उनके’ सब विरोधी
मार्क्सवादी ही लगने लगें।
भगत सिंह, अंबेडकर, जे पी …
और लेते जाइये इनके समानधर्मा लोगों के नाम
उड़ा लीजिये मज़ाक,
भेज दीजिये ऊट पटांग व्हाट्सअप मेसेज
बना लीजिए हिलेरियस कार्टून
इन सबकी औकात को समेट दीजिये
हास्यास्पद चुटकुलों में
सुना नहीं हंसी खून बढ़ाती है।
लोकतंत्र ज़िंदा है इस देश में।

पर खबरदार
इस सीढ़ी के शिखर पर
बाकी लोग जन नहीं हैं।

जानते नहीं सूरज पर थूकने की मनाही है इन दिनों।
हवाएं सन्देश ही नहीं तुम्हारी हरकतें भांप रही हैं
ब्रेख्त को याद करो
“सभी अफसर उनके…नेता और गुंडे तक उनके’
(प्रज्ञा , 20 मार्च ) फेसबुक वाल से साभार…..

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