Home दिल्ली ख़ास इतिहास /पुरातत्व (शहीद दिवस पर विशेष) – फाँसी की सजा होने पर भगतसिंह ने बटुकेश्वर दत्त को यह पत्र लिखा….

(शहीद दिवस पर विशेष) – फाँसी की सजा होने पर भगतसिंह ने बटुकेश्वर दत्त को यह पत्र लिखा….

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23 मार्च, 2019/शाईन दिल्ली

‘लाहौर षड़यंत्र केस’ में जब सरदार भगतसिंह को फाँसी की सजा का फैसला सुनाया गया, तब उन्होंने अपने साथी बटुकेश्वर दत्त को यह पत्र लिखा-

‘प्रिय बटुक’

दीर्घकाल तक हम लोगों का विचार-प्रहसन चलने के बाद अब उस पर यवनिका पात हुआ। न्यायाधीशों ने सजाएं घोषित कर दी हैं और उन सजाओं की इत्तला हमें भेज दी गई है। मुझे फाँसी की सजा मिली है।

तुम्हें मालूम है कि मैं लाहौर जेल की उन्हीं फाँसी की कोठरियों में हूं, जहाँ चंद रोज पहले तुम मेरे साथ थे। इन फाँसी की कोठरियों में कुल पैंतालीस मृत्युदंड प्राप्त बंदी हैं, जो प्रतिक्षण अपनी अंतिम घड़ी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वे अभागे बंदी फाँसी के फंदे से छूट पाने के दिन-रात भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं। उनमें से अधिकांश अपने कृत्यकर्म के लिए अत्यंत ही अनुलप्त हैं और इन अभागे बंदियों के बीच मैं ही एक ऐसा व्यक्ति हूं, जो भगवान के बदले अपने आदर्शों में ही जिसकी ही अविचल आस्था है एवं जिस आस्था के लिए मैं मृत्यु का आलिंगन करने जा रहा हूं। मैं इसके लिए संतुष्ट हूं। तुमसे मेरा बिछोह अत्यंत ही पीड़ादायक है, लेकिन इससे कुछ विशेष उद्देश्यों की पूर्ति होगी।

मैं फाँसी के तख्ते पर अपना प्राण विसर्जित कर दुनिया को दिखाऊंगा कि क्रांतिकारी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए खुशी-खुशी आत्म-बलिदान कर सकता है। मैं तो मर जाऊंगा, लेकिन तुम आजीवन कारावास की सजा भुगतने के लिए जीवित रहोगे और मेरा दृढ़-विश्वास है कि तुम यह सिद्ध कर सकोगे कि विप्लवी अपने उद्देश्यों के लिए आजीवन तिल-तिलकर यंत्रणाएँ को सहन कर सकता है। मृत्युदंड पाने से तुम बचे हो और मिलनेवाली यन्त्रणाएँ को सहन करते हुए दिखा सकोगे कि फाँसी का फन्दा, जिसके आलिंगन के लिए मैं तैयार बैठा हूं, यंत्रणाओं से बच निकलने का उपाय नहीं है। जीवित रहकर विप्लवी जीवनभर मुसीबतें झेलने की दृढ़ता रखते हैं।

तुम्हारा भगतसिंह
22, मार्च, 1931

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