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ऑटिज्म पीड़ित बच्चों से प्यार से पेश आना जरूरी है

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ऑटिज्म व्यक्ति की बोलचाल, सामाजिक मेल जोल, भाशा और व्यवहार को प्रभावित करने वाला न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर है। नवीनतम अध्ययन के अनुसार, लगभग 70 बच्चों में से एक बच्चा ऑटिज्म से पीड़ित होता है। भारत में हर साल आॅटिज्म के लगभग 11914 मामले सामने आते हैं। ऑटिज्म एक ‘स्पेक्ट्रम’ डिसआर्डर है क्योंकि इसके लक्षण लगातार मौजूद रहते हैं और इसके लक्षण हल्के से गंभीर तक हो सकते हैं।

ऑटिज्म में मुख्य रूप से बोलचाल और सामाजिक मेल जोल में कठिनाई होती है, भावनाओं को व्यक्त करने में कठिनाई होती है। बच्चा प्रकाष, स्वाद और आवाज के प्रति अधिक संवेदनषील होता है और इनके प्रति असामान्य प्रतिक्रिया करता है। ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) से ग्रस्त बच्चे को साथियों से मेल जोल रखने में दिक्कत हो सकती है, वे अपने नाम पुकारे जाने पर तुरंत प्रतिक्रिया नहीं कर पातेे हैं, वे किसी से आंख मिलाकर बात करने में संकुचाते हैं और वे किसी भी व्यवहार का बार-बार प्रदर्षन करते हैं। ऑटिज्म को लेकर समाज में गलत धारणाएं कायम हैं और इसलिए माता-पिता के लिए, ऑटिज्म की पहचान और इलाज एक चुनौती बनी हुई है। वे इस मामले में खुद को असहाय महसूस करते हैं और इस कारण बीमारी बढ़ती जाती है। उन्हें पारिवारिक और सामाजिक मदद भी पर्याप्त रूप से नहीं मिल पाती है।

नई दिल्ली के मैक्स हाॅस्पिटल (पटपड़गंज) में कंसल्टेंट बाल मनोचिकित्सक और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल और पुनर्वास केंद्र – उदगम के निदेषक डॉ. राजेश कुमार बताते हैं कि इस बीमारी से प्रभावित बच्चों की देखभाल में पैसे की कमी, सही चिकित्सकों का उपलब्ध नहीं होना, माता-पिता से पर्याप्त सहयोग नहीं मिल पाना और जागरूकता की कमी जैसी कई बाधाएं आती हैं।
डा. राजेष कुमार ने कहा कि समाज के सामाजिक और जिम्मेदार सदस्यों के रूप में हमें आगे आना चाहिए और सरकार और लोगों में इस संबंध में जागरूकता पैदा करनी चाहिए। इन पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, उदगम की टीम ने नई दिल्ली के कृश्णा नगर स्थित किड्जी स्कूल में जागरूकता अभियान का आयोजन किया, जहाँ प्रबंधन, शिक्षकों, अभिभावकों और बच्चों को ऑटिज्म के बारे में जागरूक किया गया।

ऑटिज्म के निदान में, माता-पिता के प्रशिक्षण और बच्चे के व्यवहार को संतुलित करने में क्लिनिकल साइकोलाॅजिस्ट महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उदगम में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट सुश्री इरा गुप्ता के अनुसार, इस बीमारी की जल्द से जल्द पहचान और इलाज महत्वपूर्ण है। एएसडी का निदान 3 वर्ष की उम्र में ही किया जा सकता है जिसके बाद आवश्यक इलाज शुरू किया जा सकता है, जिससे बच्चे और परिवार दोनों के जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि होगी।

मनोचिकित्सक डा. राजेेश कुमार का यह भी मानना है कि ऑटिज्म के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ, ऑटिज्म को स्वीकार करने और आॅटिज्म पीड़ित बच्चे के साथ सामान्य व्यवहार करने की भी आवश्यकता है। जागरूकता इस प्रक्रिया का पहला कदम है, और आवष्यक सहयोग और समय पर इलाज जारी रखना चाहिए। आजकल हर जगह इसका इलाज और ऑटिज्म के विषेश प्रषिक्षक उपलब्ध हैं। इसलिए इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए, बच्चे को समाज में षामिल करना चाहिए और इनका हर संभव सहयोग किया जाना चाहिए। उदगम से जुड़े वरिष्ठ स्पीच थेरेपिस्ट डॉ. मुरली सिंह भी ऑटिज्म से पीड़ित लोगों के साथ पूर्ण सहयोग और इन्हें समाज में षामिल करने की जरूरत पर बल देते हुए कहते है कि प्यार सबसे अच्छा मरहम लगाता है। उन्हें अपने कौशल का उपयोग करने के लिए प्राकृतिक अवसर या परिस्थितियां दी जानी चाहिए। लगातार स्पीच और लैंग्वेज थेरेपी कराने से उन्हें अपने बोलचाल के कौशल का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग करने में मदद मिलेगी।

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