शहीद की शुरुआत

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13 अप्रैल, 1919
बैसाखी।
नवाकोट, लाहौर का वह मकान-वही, जो प्रकाश से पूरी तरह भरा हुआ है।
रात गहरा गई है।
उमस काफी है।
मकान के आँगन में कई चारपाइयां बिछी हैं। एक पर है सरदार किशनसिंह, एक पर मां विद्यावति, एक पर छोटी अमरकौर, और एक पर एक किशोर।
सब सो गए हैं, किशोर जाग रहा है-कुछ पढ़ रहा है।
पढ़ नहीं, कुछ गढ़ रखा है।
‘‘भगत!’’ ‘‘मां की आंख खुल गई-‘‘तू सोया नईं पुत्तर!’’
‘‘नहीं बेबे!’’
‘‘बत्ती बुझा दो और सोओ।’’
भगत सिंह ने कोई उत्तर नहीं दिया। कुछ देर चुप्पी रही। फिर मां ने सुना-‘‘बेबे!’’ ‘‘बहुत खून हुआ है न वहां?’’
विद्यावती उठ बैठी। पुत्र के पास गई और उसका सिर सहलाने लगी। भगत ने फिर पूछा-‘‘हैं बेबे! बहुत खून हुआ है न?’’
‘‘हां, बहुत।’’
‘‘धरती लाल हो गई होगी?’’
‘‘हां।’’

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