Home दिल्ली ख़ास कला/साहित्य / संस्कृति ‘माँ’ : मदर्स-डे पर एक कविता

‘माँ’ : मदर्स-डे पर एक कविता

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  • डॉ. ब्रजभूषण मिश्र
कूट कूट कर भरा है जिसमें
केवल एक ही स्वार्थ
वो जी ती है सर्वदा
बच्चों के हितार्थ
उसको चिन्ता नहीं कभी
इस पूरे संसार की
चिन्ता उसको है केवल
बच्चों के घरबार की
और भी बातें  हैं जीवन में
उसे समय ये सोचने से रोके
उसकी सोच बहुत सीमित
वह केवल बच्चों की सोचे
बच्चों की मांगें, माने
जीना बस इसको जाने
हैं उसके बच्चे, उसका गर्व
हैं वही, उसे जीवन के पर्व
बच्चों की उपलब्धियाँ
होते हैं, उसके सुख
जीवन के हर क्षण और पल
उसे सूक्ष्म हैं, इसके सम्मुख
बच्चे यदि देते हैं पीड़ा
तो भी, वो समझे क्रीड़ा
इनकी जिम्मेदारी का है
उठा रखा,उसने बीड़ा
स्वयम हो खाली पेट भी,पूछती
क्या बेटे तुमने कुछ खाया
है ईश्वर ने ऐसी रची
हे माँ, तेरी ये काया
हे माँ,तेरी छाती में है भरा
सब बच्चों का जीवन अमृत
तेरे प्रेम और त्याग बिना
ब्रज, होती ये दुनिया ही मृत
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