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फिल्म रिव्यू : जीतने का मजा तब आता है, जब सब आपके हारने की उम्मीद करते हैं : पीएम नरेंद्र मोदी

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( के. कुमार )

फिल्म : पीएम नरेंद्र मोदी

रेटिंग : 3.5

कलाकार : विवेक ओबेरॉय, मनोज जोशी, वूमेन इरानी, प्रशांत नारायण, जरीना वहाब, राजेंद्र गुप्ता।

निर्देशक : उमंग कुमार।

अवधि : 2 घंटा 16 मिनट।

अखण्ड भारत की सोच रखने वाले व्यक्तित्व पीएम नरेंद्र मोदी एक बार फिर पीएम बनने का अवसर जीत चुके हैं। साथ ही उन पर बनी फिल्म ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ भी उनकी जीत के साथ रिलीज हो चुकी है। असल में फिल्म तो काफी पहले रिलीज होनी थी, लेकिन चुनाव आयोग द्वारा लगाई गई आचार संहिता के चलते वह रिलीज न हो सकी। लेकिन फिल्म देखकर लगता है, कि फिल्म पहले ही रिलीज हो जानी चाहिए थी।

‘देश भक्ति ही मेरी शक्ति है’, ‘मोदी एक इंसान नहीं एक सोच है।‘, ‘हम गुजरात में धंधा होने देंगें, गुजरात का धंधा नहीं।’, ‘जीतने का मजा तब आता है, जब सब आपके हारने की उम्मीद करते हैं,, जैसे दमदार वाक्य उस इंसान के कद को और भी ऊंचा कर देते हैं, जो देशहीत की सोचता है।

बचपन से प्रधानमंत्री बनने तक की यात्रा की कहानी का नाम ही है ‘पीएम नरेंद्र मोदी’। एक बच्चा जिसके अंतर्मन में देश के प्रति कुछ कर गुजरने की सोच हो, और वह उस सोच के चलते ही अपने परिश्रम के बल पर अपनी सोच को साकार कर दे, ऐसी शख्सियत बिरले देखने को ही मिलती है।

फिल्म की कहानी शुरू होती है, 2013 की बीजेपी की एक बैठक से, जिसमें नरेंद्र मोदी (विवेक ओबरॉय) को पीएम का उम्मीदवार घोषित किया जाता है। लेकिन कहानी मोदी के बचपन में चली जाती है, जब वह एक रेलवे स्टेशन पर चाय बेचते थे। उनके पिता की चाय की दुकान थी और मां लोगों के घरों में बर्तन धोने का काम करती थीं। बचपन में नरेंद्र देश के प्रति सेवा करने वाले लोगों से प्रेरित होते थे। देशभक्ति की  इसी सोच के साथ उनका जीवन चलता गया, और वे बड़े हो गये, सो माता-पिता ने शादी की सोची, लेकिन उन्होंने साफ इंकार कर दिया और एक संन्यासी जीवन व्यतीत करने की इच्छा जाहिर की। घरवाले बेहद नाराज हुए, लेकिन उनके सामने माता-पिता की एक न चली और वे घर-वार त्याग चल पड़े, हिमालय की वादियों में, वहां पहुंचकर उन्हें एक ऋषि से काफी ज्ञान मिला, जिसके बाद उन्हें अपने व्यक्तित्व के होने का एहसास हुआ और उन्होंने अपने को परखते हुए वहां से आकर गुजरात में वीजेपी में आरएसएस वर्कर की तरह जुड़ाव किया, जिसके बाद उनके जीवन का सफर चलता ही चला गया।

मोदी ने अपनी सोच, सूझबूझ और अपने परिश्रम के बल पर सबको जोड़ते हुए उन्होंने वीजेपी को किस मुकाम पर पहुंचाया? किस तरह एक चाय बेचने वाला बच्चा जीवन में आगे चलकर पीएम पद का उम्मीदवार बना? गुजरात दंगों के पीछे क्या वजह थी? जैसे सवालों के साथ ही, मोदी के जीवन के बेहद मार्मिक पहलुओं को जानने और समझने के लिए आपको फिल्म ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ को एकबार जरूर देखना चाहिए। फिल्म में काफी कुछ सत्य है, तो कुछ दर्शकों के लिए काल्पनिक दृष्टि का समावेश भी।

लगभग 2 घंटा 16 मिनट की फिल्म की कहानी क्रिएटिव प्रड्यूसर संदीप द्वारा लिखी गई। कहानी को विवेक ऑबरॉय ने अपने अभिनय के बल पर बेहद सुंदर तरीके से पर्दे पर उतारा है। प्रथम चरण में फिल्म कही कहानी मोदी के बचपन और गुजरात दंगों के पीछे के षड्यंत्र को बयां करती है, तो वहीं दूसरे चरण में उनके पीएम बनने तक के सफर को चित्रित किया गया है। कह सकते हैं कि मोदी के रूप में विवेक ऑबरॉय ने अच्छा अभिनय किया है, चाहे उनका हाव-भाव हो, या उनके बोलने का तरीका। उनका लुक भी काफी मोदी के करीब दिखाया गया है।

अन्य कलाकारों की बात करें तो, उनमें अमित शाह के रूप में मनोज जोशी भी ठीकठाक लगते हैं, वहीं रतन टाटा के रूप में वूमन ईरानी भी परफेक्ट। अगर फिल्म के फिल्मांकन दृश्यों की बात करें तो हिमालय के दृश्यों में मोदी का विचारण करना आपको जरूर लुभाएगा। संगीत भी कहानी के अनुरूप मन को छूता है।

दर्शक पीएम नरेंद्र मोदी के जीवन को, उनके अथाह परिश्रम और त्याग को जानने के लिए फिल्म को जरूर देखें साथ ही उनके फिर से पीएम बनने के जश्न को मनाने के लिए भी अपने परिवार संग इस फिल्म को देखने अवश्य जाएं। क्योंकि…..

जीतने का मजा तब आता है, जब सब आपके हारने की उम्मीद करते हैं….।

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