Home स्वास्थ / सौंदर्य हेल्थ : सोशल मीडिया के माध्यमों से स्वास्थ्य संबंधी चिकित्सक से सलाह के चक्कर में न पड़ें

हेल्थ : सोशल मीडिया के माध्यमों से स्वास्थ्य संबंधी चिकित्सक से सलाह के चक्कर में न पड़ें

2 second read
0
1
23
  • केवल रजिस्टर्ड चिकित्सक से ही स्वास्थ्य संबंधी सलाह लें : एचसीएफआई।
  • सोशल मीडिया चैनलों के माध्यम से प्रसारित उपचार स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं।

सोशल मीडिया पर कैंसर के इलाज हेतु व्यापक रूप से साझा की जा रही अवैज्ञानिक चमत्कारी इलाज विधियों से भारत के कैंसर विशेषज्ञों को जूझना पड़ रहा है। हाल ही में, देश के प्रमुख कैंसर संस्थान, टाटा मेमोरियल सेंटर (टीएमसी) मुंबई को एक व्हाट्सएप संदेश का खंडन जारी करना पड़ा, जिसमें टीएमसी के हवाले से दावा किया गया था कि गर्म नारियल पानी सभी प्रकार की कैंसर कोशिकाओं को नष्ट कर सकता है।

अक्सर, कई अप्रासंगिक और व्यापक रूप से प्रसारित अवैज्ञानिक उपचार रोगियों को बीमारियों का इलाज करवाने से रोक देते हैं। इस तथ्य पर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है कि लोगों को सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए या फैले ऐसे झूठे दावों और चमत्कार के उपायों से प्रभावित नहीं होना चाहिए।

“किसी भी जटिलता को प्रबंधित करने में लगाए गए पूर्वानुमान, पहचान और तीव्रता की क्षमता से एक अच्छे चिकित्सक की विशिष्ट पहचान बनती है और वह दूसरों से अलग दिखायी देता है। ऐसे नैदानिक और प्रक्रियात्मक कौशल को प्राप्त करने के लिए, एक डॉक्टर वर्षों तक कठोर अध्ययन और प्रशिक्षण लेता है। तभी वे रोगी के लिए सही निर्णय लेने और बदलती प्रेक्टिस के अनुकूल होने के लिए पर्याप्त ज्ञान, विवेक और कौशल विकसित कर पाते हैं। हालांकि, आज, सोशल मीडिया पर लोग, क्योर-मॉन्गर्स, क्वैक्स और डाइट गुरुओं के मेडिकल फंडे जारी कर देते हैं और लोग वैकल्पिक, अवैज्ञानिक उपचार विधियों की ओर आकर्षित होने लगते हैं। ये कुछ लोगों को भ्रमित करते हैं और अन्य इन पर विश्वास करते हुए ये उपाय करने लगते हैं। पुरानी बीमारियों जैसे मधुमेह के बारे में फर्जी समाचारों और इनके चमत्कारिक उपचारों तक, सोशल मीडिया पर पोस्ट्स की भरमार है, और ये स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकते हैं।”

ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954 भारत की संसद का एक अधिनियम है, जो भारत में दवाओं के विज्ञापन को नियंत्रित करता है। यह ऐसी दवाओं और उपचारों के विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाता है जो जादुई गुण होने का दावा करते हैं और ऐसा संज्ञेय अपराध करते हैं।

“नीम-हकीमी के खिलाफ एक केंद्रीय अधिनियम की तत्काल आवश्यकता है। क्वैकरी आज एक बहुत बड़ा मुद्दा है। ऐसे अयोग्य लोग भी दवा लिख रहे हैं, जिनके बारे में उन्हें पता भी नहीं है। यह जटिलताओं की ओर ले जाता है और आगे हम, डॉक्टरों पर उपेक्षा का आरोप लगाया जाता है। इससे हमारे अस्पतालों में मृत्यु दर भी बढ़ती जा रही है, जो पर्याप्त डेटा की कमी के कारण कभी-कभी हमें पता भी नहीं चल पाती है।”

नीम-हकीमों से सावधान रहें, क्योंकि वे कटौती और कमीशन में लिप्त होते हैं, कभी भी रोगी को समय पर रैफर नहीं करते हैं, हमेशा हर मामले में स्टेरॉयड देते हैं, और असली दिखने के लिए रोगी की जांच कराते हैं। दूसरी ओर, लोगों को पंजीकृत और योग्य डॉक्टरों पर विश्वास होना चाहिए, क्योंकि वे अनैतिक प्रथाओं में लिप्त नहीं होते हैं, कमीशन न लेते, न देते हैं, प्राथमिक उद्देश्य के साथ काम करते हैं और चिकित्सा के धर्म और वित्तीय लाभ नहीं, कर्म में विश्वास करते हैं और क्रिया नहीं, और हमेशा सर्वोत्तम हित वाले रोगियों का मार्गदर्शन करते हैं।
फर्जी खबरों के खिलाफ भी कानून होना चाहिए, क्योंकि यह समुदाय में सामाजिक अशांति पैदा कर सकती हैं और समाज को समूहों को टुकड़ों में बांट सकती हैं। फर्जी खबरों का एक अवांछित परिणाम हो सकता है, अशांति।

  • कोई भी अवैज्ञानिक दावा अवैध है।
  • वैज्ञानिक दावों को वैज्ञानिक पत्रिकाओं या सम्मेलन द्वारा सुधारा जाता है।
  • दावों को विशेषज्ञों या हितधारकों द्वारा प्रमाणित किया जाना चाहिए।
  • दावों में किसी विशेषज्ञों या संस्था का उल्लेख होना चाहिए।
  • एक निर्णय से एक राय को अलग करना चाहिए। व्यक्तिगत राय में वैज्ञानिक वैधता कम ही होती है।
Load More Related Articles
Load More By admin
Load More In स्वास्थ / सौंदर्य

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

MADAME TUSSAUDS DELHI UNVEILS THE KFC’S ZINGER AKA ‘THE ORIGINAL CELEBRITY BURGER’

(Left- Right) Mr. Moksh Chopra, CMO, KFC India, Colonel Sanders and Mr. Anshul Jain, Gener…