Home स्वास्थ / सौंदर्य अंगदान पर जागरूकता के प्रसार में जरूरी है लीडर्स और सेलिब्रिटी की भागीदारी

अंगदान पर जागरूकता के प्रसार में जरूरी है लीडर्स और सेलिब्रिटी की भागीदारी

1 second read
0
2
41

नई दिल्ली : राजधानी में वर्ष 2018 में ब्रेन-डेड मरीजों के अंग दान की संख्या में 50 प्रतिशत से ज्यादा कमी आ गई थी। महाराष्ट्र (132), तमिलनाडु (137), तेलंगाना (167) और आंध्र प्रदेश (45) को तो छोड़िए राष्ट्रीय राजधानी अपने पड़ोसी संघ शासित क्षेत्र चंडीगढ़ (35) से भी काफी पीछे है।

प्रति वर्ष राजधानी में सड़क हादसों द्वारा ब्रेन डेड मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है। दिल्ली में हर साल लगभग 1,562 सड़क हादसे होते हैं और बड़ी संख्या में लोगों के सिर पर गहरी चोटें लगने से क्लीनिकल ब्रेन डेथ के मामले सामने आते हैं। दुनिया भर में माना जाता है कि ये बदकिस्मत लोग अंगों के संभावित दानकर्ता हैं। प्रति मिलियन आबादी (10 लाख लोगों पर) पर 0.5 डोनर के साथ भारत, दुनिया में सबसे कम अंग दान की दर वाले देशों में से एक है, अतः स्कूली बच्चों, कॉर्पोरेट्स एवं सेलिब्रिटीज के बीच जागरूकता फैलाने की हर कोशिश से इस दिशा में मदद मिलती है।

भारत में स्वास्थ्य और चिकित्सा सुविधाओं में व्यापक सुधार के बावजूद अंगों की अनुपलब्धता के चलते हर साल भारत में 5 लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है। ऐसे मरीज जिनके जीवित रहने के लिए प्रत्यर्पण ही अंतिम विकल्प है, उनके लिए देश में डोनर्स की भारी कमी कष्टकर हकीकत साबित हो रही है। डायरेक्टर और चेयरमैन डॉ. संदीप अत्तावर (हृदय और फेफड़े कार्यक्रम) की अगुआई में ग्लेनईगल्स ग्लोबल हॉस्पिटल्स की हृदय और फेफड़ा प्रत्यारोपण टीम टीम को पिछले 25 महीने में 196 प्रत्यारोपण का श्रेय जाता है।

इस प्रोग्राम का सफलता का मुख्य श्रेय टीम की विशेषज्ञता और क्षमता को जाता है। इसके परिणामस्वरूप यह देश का एकमात्र ऐसा प्रोग्राम है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानकों का पालन करते हुए बड़ी संख्या में हृदय और फेफड़ों के प्रत्यारोपण करने में और एक साल से अधिक अवधि तक मरीजों को स्वस्थ रखने में सफल हुआ है।

ग्लेनईगल्स ग्लोबल हॉस्पिटल्स के नेशनल फ्लैगशिप प्रोग्राम के तहत 78 हृदय, 75 लंग और 16 हृदय-फेफड़े का संयुक्त प्रत्यारोपण हो चुका है, जो देश में बीते ढाई साल में अभी तक सबसे अधिक है। इस प्रोग्राम का मुख्य जोर प्रत्यारोपण के लिए इंतजार कर रहे मरीजों के स्वास्थ्य में स्थिरता लाना है और ऐसे मरीजों को उपयुक्त विकल्प देना है जिन्हें प्रत्यारोपण की जरूरत नहीं है। डॉ. संदीप अत्तावर ने कहा, ‘द इंटरनेशनल सोसायटी फॉर हार्ट एंड लंग ट्रांसप्लांटेशनमें प्रकाशित एक रिपोर्ट में प्रोग्राम की 85 प्रतिशत सफलता की दर की पुष्टि की गई है। साथ ही हमारा हृदय और फेफड़े प्रत्यारोपण प्रोग्राम अब पश्चिमी देशों के कुछ सर्वश्रेष्ठ केंद्रों के समान स्तर का स्थापित हो गया है।’

डॉ. अत्तावर ने कहा, ‘विभिन्न कारणों के चलते भारत में स्वास्थ्य के संकेतकों में खासी गिरावट के अलावा हृदय और लंग के फेल होने की वजहों में जेनेटिक असामान्यताएं, इस्केमिक हृदय की बीमारियां, मधुमेह (भारत को मधुमेह की राजधानी माना जाता है), धूम्रपान की आदत, प्रदूषण, तनाव, खानपान की खराब आदतों, मोटापे के स्तर में बढ़ोतरी और जीवनशैली से जुड़ी दिक्कतें शामिल हैं। नतीजतन, बीमारी के अंतिम चरण में पहुंचने वाले मरीजों की संख्या खासी ज्यादा हो गई है जिनकी जिंदगी प्रत्यारोपण से ही बच सकती है। भले ही 2018 के इप्सॉस सर्वे में 74 प्रतिशत भारतीयों ने माना कि वे जरूरतमंदों की मदद के लिए अपने अंगों को दान करने की अनुमति देंगे, लेकिन भारत में मृतक दानदाताओं की दान की दर अभी भी महज 0.34 प्रति मिलियन है, जो स्पेन (36), क्रोएशिया (35), अमेरिका (27.02) जैसे अन्य विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। हृदय प्रत्यारोपण के लिए सालाना 50,000 से ज्यादा और फेफड़े प्रत्यारोपण के लिए सालाना 20,000 से ज्यादा मरीजों की सूची के साथ प्रत्यारोपण के लिए प्रतीक्षा सूची और उपलब्ध अंगों के बीच खासा अंतर है।’ दक्षिण एशिया की सर्वश्रेष्ठ टीमों में से एक टीम 4 शहरों में परिचालित ग्लेनईगल्स ग्लोबल हॉस्पिटल्स में हृदय और फेफड़ों के प्रत्यारोपण के प्रोग्राम को आगे बढ़ा रही है।

भारत में जागरूकता की कमी, हैल्थकेयर सिस्टम पर भरोसे की कमी, धार्मिक मान्यताएं और अंधविश्वास आदि ऐसी कई सामाजिक सांस्कृतिक वजह हैं, जिनके कारण परिवार अंग दान के लिए सहमति देने से बचते रहे हैं। ऐसे हालात में डॉ. संदीप नेशनल रजिस्ट्री फॉर ऑर्गन डोनर में पंजीकरण के महत्व और उसके सकारात्मक प्रभाव के बारे में बताते हैं। सरकार के लिए जनता तक ज्यादा अंगों की जरूरत, परिजनों के साथ अंग दान पर चर्चा, अंग दान की प्रक्रिया के बारे में फैली भ्रांतियां दूर करने, मृतकों के अंगदान को लेकर दृष्टिकोण में बदलाव लाने और बुनियादी ढांचे से जुड़ी खामियों को दूर करने पर केंद्रित अभियान चलाने की जरूरत है।

डॉ. अत्तावर एक निःस्वार्थ आशावाद को जाहिर करते हुए कहते हैं, ‘लीडर्स, सेलिब्रिटी और हम सभी को बदलाव के एजेंट के रूप में जागरूकता फैलाने के प्रयास करने की जरूरत है। सिर्फ समर्थन करने से कुछ नहीं होगा, हमें अपने अंगों को दानहार्ट देने का संकल्प लेकर उदाहरण पेश करना होगा। सोचिए, अगर देश के प्रमुख, प्रसिद्ध राजनेता और सेलिब्रिटीज लोगों से कहें कि उन्होंने अपने अंग दान करने का संकल्प लिया है और वे दूसरों से भी ऐसा करने का आह्वान करें तो इससे आमूलचूल बदलाव होगा और हजारों जिंदगियां बचाई जा सकेंगी। भारत के दक्षिणी और पश्चिमी हिस्सों में जागरूकता का स्तर खासा ज्यादा है, जिसे हमें उत्तर भारतीय राज्यों में भी फैलाने की जरूरत है।’

तकनीक के तीव्र विकास, समय से सही इलाज और सर्जरी से हृदय और फेफड़ों के प्रत्यारोपण के मरीज पहले से ज्यादा समय तक एवं स्वस्थ जीवन जी रहे हैं। बेहतर इलाज और प्रतिरक्षक दवाओं के चलते अब हृदय प्रत्यारोपण कराने वाले ऑपरेशन के बाद 3 साल से ज्यादा समय तक जीवन जी रहे हैं। हमारे देश के लिए फेफड़ों का प्रत्यारोपण तुलनात्मक रूप से नई प्रक्रिया है, जिसके लिए ज्यादा स्वीकार्यता दिख रही है। वर्तमान में फेफड़े का प्रत्यारोपण कराने वाले 65 प्रतिशत से ज्यादा मरीज ऑपरेशन के बाद कम से कम 5 साल तक स्वस्थ जीवन व्यतीत करते हैं।

Load More Related Articles
Load More By admin
Load More In स्वास्थ / सौंदर्य

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

Strong, Dynamic & Confident is back with an all New Season

The 8th Edition of Miss Diva 2020 announced its partnership with LIVA – Natural Fluid Fash…