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ज़ख़्म अनगिन हैं मेरी ग़ज़लों में गिनकर देखिए

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जख़्म अनगिन हैं मेरी ग़ज़लों में गिनकर देखिए,
गिल्टियों पर जो लगे गहरे वो नश्तर देखिए।

बह रहे शिखरों के आंसू घाटियां बेचैन हैं,
मेघ की मानिंद उनके दुख उमड़कर देखिए।

जानना चाहें वजह ठोकर की आखिर है तो क्या,
और ऊपर और ऊपर और ऊपर देखिए।

इल्म से फसलें नहीं फसलों से उगता इल्म है,
जांचनी हो बात ये तो रोज खटकर देखिए।

ये महज ग़ज़लें नहीं हैं आईना हैं वक्त का,
देखना हो गर स्वयं को भी ठहरकर देखिए।

सद्यः प्रकाशिग़ज़ल – संग्रह ‘मुश्किलें कुछ और’ से

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