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शिवरात्रि विशेष : शिव हैं सबके ईश

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शिव में संपूर्ण निहित है, और वे सृष्टि समन्वय का अनुपम उदाहरण हैं। वे कपूर की भांति गौर वर्ण के हैं, तो उन्हें कृष्ण वर्ण भी कहा गया है। एक ओर वे रौद्र रूप वाले हैं, तो दूसरी ओर भोलेनाथ भी हें, इसीलिए उन्हें देवों का देव भी कहा जाता है।

शिव हर समय अध्यात्मिक सुधारस में मग्न रहते थे। इसलिए बहुत से लोग सोचते थे कि चांद में जिस सोलहवीं कला को हम ‘अमाकला’ कहकर पुकारते हैं और देख नहीं पाते, वह शिव के मस्तक पर है। इस सुधारस ने ही षिव को भोलेनाथ बना दिया है। शिव क्या केवल शुभ्र त्वचा वाले ही हैं? या सुधारस के प्रकाष में उनका सारा शरीर ज्योमिर्मय है? विविध मणि-माणिक्यों की ज्योति से जैसी झलक निकलती है, शिव की शुभ्र देह से उसी प्रकार की चमक ण्लकती है। इसी कारण कहा गया है-शिव का माधुर्य से परिपूर्ण, सुगन्धमय कोमल शरीर इस वर्ण की उज्ज्वलता से और भी अधिक मनोरम व मनोहर बन गया है। अत्याचारियों के अहंकार का दमन करने के लिए उनके हाथ में है परशु। शिव ने मनुष्य जगत, पशु जगत, पादप जगत-सबका ही संतान के समान लालन-पालन किया और प्राणपण से प्यार किया। इस कारण शिव के पास मृगों का दल निर्भय होकर जाता था। इस कारण शिव के पास आकर कोई भी पशु आश्रय पाता था। पीड़ित मनुष्य, पीड़ित पशु जब भय से त्रस्त होकर शिव के पास आते, तब षिव उनहें अभय देते थे। उनके कल्याण के लिए उन्हें वरदान दिया करते थे। भोले-भाले शिव दृष्टों की आंखों में भी आंसु देखकर स्थितर नहीं रह सकते थे। वे उन्हें भी वरदान देकर उनके लिए संशोधान का मार्ग प्रस्तुत करते थे। हर स्थित में ही उनमें मानसिक साम्य बना रहता था। धेर विपत्ति के समय भी उनके चेहरे की हंसी नहीं कम होती थी। रुदन में टूट जाने वाली स्थित में भी वे हंसते ही रहते थे। विश्व के इतिहास में इस प्रकार का सदा प्रसन्न चेहरा विरला ही मिल पाएगा। कहा जाता हे, जो अमर हैं, वे भी देवों के देव महादेव की स्तुति करते हैं और उनके चरणों में सिर झुकते हैं।

नियम है-जिसमें सामथ्र्य है, वह यदि अपने से दूसरों में अधिक सामथ्र्य देखता है, तो वह उसकी स्तुति करता है। इस कारण जगत के समस्त देव शिव की स्तुति करते हैं-हे प्रभु शिव! तुम सबके ईश, महेश हो। किंतु तुम स्वयं अनीश हो अर्थात तुम्हारे कोई ईश नहीं है। हे शिव! गुणों का विचार करते समय, गुणों की गंभीरता मापते समय हम तुम्हारी थाह नहीं पा सकते, क्योंकि तुम अशेषगुण हो। हे शिव, अपनी उज्ज्वलता बढ़ाने के लिए, अपने को अधिक से अधिकतर प्रकाशमय बनाने के लिए विभिन्न देवताओं के कानों में, कण्ठ में, बाहुओं में, कांटे में अजस्त्र प्रकार के अलंकार व मणिहार हैं, ंिकंतु तुम्हारी थाह नहीं पा सकते, क्योंकि तुम अशेषगुण हो। हे शिव, अपनी उज्जवलता बढ़ाने के लिए अपने को अधिक से अधिकतर प्रकाशमय बनाने के लिए विभिन्न देवताओं के कानों में, कण्ठ में बाहुओं में, कटि में अजस्त्र प्रकार के अलंकार व मणिहार हैं, किंतु तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है। तुम्हारे प्रिय भक्तगण, तुम्हारे अति प्रियगण… प्राणों से प्रिय तुम्हारी संतान… ये ही तुम्हारे अलकार हैं।ये ही तुम्हारे मणिहार हैं, इनसे ही तुम्हारा गौरव है। इनके बारे में सोचकर ही तुमने अपने दिन बिना दिए। हे शिव! तुम्हारा गौरव है। इनके बारे में सोचकर ही तुमनअ पने दिन बिता दिए। हे शिव् तुम्हारे गुणों का वर्णन करना मनुष्य की सामथ्र्य से बहार है।

हे आदिपिता, आदिेदव, मंत्रेश, महादेव! तुम्हारे गुणों का वर्णन करना संभव नहीं। यदि विराट हिमलाय के समान बहुत बड़ी दवात लेकर उसमें समुद्र की जलराशि जितनी मसी (स्याही) डाल दें और स्वर्ग के पारिजात वृक्ष की शाखा की लेखनी (कलम) के रूप में प्रयोग की जाए और इन सबको लेकर सवयं विद्या की अधिष्ठात्री देवी अनंतकाल तक लिखती रहें, तब भी तुम्हारी गुणराशि को लिखकर समाप्त नहीं किया जा सकेगा।

सभी एह वाक्य में कहते हैं-तुम हमारे पिता हो, तुम हमारे आदिपिता हो, तुम हमारे तारक ब्रह्म हो, तुम ही हमारे सब कुछ हो। तुम्हारे चरणों में हम बारंबार प्रणाम करते हैं। पृथ्वी की छोटी-बड़ी समस्त चीजों वे विभिन्न मर्यादाओं के नियंत्रक हैं शिव। जिनका पौरुष से दीप्त मन, जिनकी प्रज्ञा से समृद्ध मानसिकता, जिनका ममतासिक्त हृदय है, केवल वे ही इन समस्त छोटे-बडे व मध्यम नियंत्रकों के नियंत्रक हो सकते हैं। ‘तुम ईश्वरों के अर्थात नियंत्रकों के महेश्व हो, तुम देवताओं के महादेव हो। तुम अधिपतियों के महाधिपति हो। तुम श्रेष्ठों में रेष्ठतम हो। तुम समस्त विश्व में पूजनीय हो। इस करण हे शिव, तुम्हें मैं जानंू या न जानंू, तुम सबके ईश हो, तुम महेश हो।’ प्रस्तुति: आचार्य दिव्यचेतनान्द (साभार: एचटी)

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