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शरीर को आनंद के साथ छोड़ना है समाधिमरण

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  • आचार्य श्री ज्ञानसागर जी

देश-विदेश के स्कॉलर्स ने समझा-समाधि का महत्त्व

नई दिल्ली : नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में फ्रांस ,जर्मनी, पेरिस, दिल्ली एवं विश्व के प्रमुख विश्वविद्यालयों ने संथारा, सल्लेखना, इच्छामृत्यु, सेरोगेसी, गर्भपात, आत्महत्या, अंगदान विषय पर जीवन और मृत्यु से सम्बंधित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया। इस अकादमिक महाकुम्भ में विश्व के विभिन्न स्थानों से पधारे शताधिक विधि विशेषज्ञ, समाज शास्त्री, नीति निर्माता एवं समाजसेवी भाग ले रहे हैं।

सम्मलेन का आयोजन 24 फरवरी से 28 फरवरी 2020 तक नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के आडिटोरियम में किया जा रहा है, जो जर्मनी के यूनीवर्सिटैट पोट्सडैम, फ्रांस के यूनिवर्सिटे पेरिस नन्तेरी और यूनिवर्सिटे फ्रैंको अलिमांदे ड्यूस-फ्रैजोशिशे होक्शुले तथा सेंटर फॉर लिंग्विस्टिक जस्टिस एंड इंडेंन्दर्ड लैंग्वेजेज ,दिल्ली के सहयोग से किया जा रहा है। इस आयोजन में सम्मिलित सभी यूनिवर्सिटीज ने परम पूज्य सराकोद्धारक आचार्य श्री 108 ज्ञानसागर जी महाराज से जैनदर्शन के अनुसार“ जीवन और मरण की प्रक्रिया विशेष रूप से संथारा/सल्लेखना/समाधिमरण” पर संबोधन के लिए निवेदन किया गया था लेकिन आचार्य श्री वर्तमान में राजस्थान के प्रवास पर है, इस हेतु आचार्य श्री जी की वीडियो रिकॉर्डिंग को सम्मेलन के प्रथम दिवस पर प्रस्तुत किया गया। आचार्य श्री ने अपने सम्बोधन में कहा कि….

  • जीवन के साथ मृत्यु की कला सिखाता है जैन धर्म

वीडियो उद्बोधन के माध्यम से सुप्रसिद्ध दर्शनवेत्ता, सराकोद्धारक आचार्यश्री 108 ज्ञानसागर जी महाराज ने विषय को विस्तार देते हुए अपने उपदेश में स्पष्ट किया कि भारतीय संस्कृति एक महत्वपूर्ण संस्कृति है, आध्यात्मिकता, अहिंसा, अनेकांतवाद-स्याद्वाद, अपरिग्रह जैसे सिद्धांत इस संस्कृति ने प्रदान किये हैं, जैनधर्म में समाधिमरण को सल्लेखना, संथारा के नाम से जाना जाता है जो वैज्ञानिक तरीके से जीवन जीने के साथ-साथ मृत्यु की कला सिखाते हुए, आनंद के साथ शरीर छोड़ने की एक कला है।
समाधिमरण में दुर्भावनाओं, लालसाओं को घटाना, शरीर- आत्मा अलग-अलग हैं का चिंतन करना प्रमुख होता है, समाधिमरण में क्रमशः शरीर के प्रति आसक्ति को घटाते हुए हम नश्वर शरीर को इस प्रकार छोड़ते हैं जैसे कि नये कपड़े के लिए पुराने कपड़े छोड़ते हैं। आधि- व्याधि-उपाधि से रहित अवस्था समाधि कहलाती है। जिस प्रकार सूर्य जब अस्ताचल की ओर जाता है, तो वह समाप्त नहीं होता वह अगले दिन पूर्ण ऊर्जा से पुनः उदित होता है समाधिमरण में मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति शरीर छोड़ता है उसकी आत्मा पुनः ऊर्जा के अनुसार नवीन गति को धारण करती है।

  • समाधिमरण, महोत्सव है, आत्महत्या नहीं

समाज में सल्लेखना के सन्दर्भ में व्याप्त भ्रान्ति का समूल उन्मूलन करते हुए पूज्य आचार्यश्री ने अनेक पूर्वाचार्यो एवं ग्रंथों का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया कि समाधिमरण मृत्यु का महोत्सव है जो भावों की निर्मलता से धारण होकर परिणामों की पवित्रता तक ले जाकर शांत भाव से आनंद की ओर ले जाता है , आत्महत्या संक्लेशित परिणामों का समूह है जो व्यक्ति विचारों की अपवित्रता के कारण करता है , उसमें वह विचार नहीं करता, वह दुरूखी होकर, परेशान होकर अपने अच्छे-बुरे के चिंतन के बिना मृत्यु को प्राप्त करता है, जबकि समाधिमरण करने के बहुत सारे नियम है। उपसर्ग अवस्था में, दुर्भिक्ष में, शरीर व इन्द्रियों की शिथिलता, वृद्धावस्था में., जब रोग लाइलाज हो तब समाधि को धारण कराया जाता है। समाधि हर कोई नहीं ले सकता है, उसके लिए पहले अध्ययन, स्वाध्याय, तप-त्याग, आत्मबल की आवश्यकता होती है। आचार्य श्री ने बताया कि प्रसिद्ध सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने आचार्य भद्रबाहु के समक्ष मुनि दीक्षा स्वीकार कर श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में समाधि को धारण किया था। इस युग में भूदान आन्दोलन के प्रणेता आचार्य विनोबा भावे ने भी समाधि मरण किया था द्यउन्होंने श्रीमती इंदिरा गाँधी को कहा था कि अब उन्हें कोई इलाज नही कराना है। ऐसे और भी अनेक उदाहरण हैं। जैनदर्शन के अनुसार 12 वर्ष की समाधि धारण की जा सकती है जिसमें धीरे-धीरे त्याग करते हुए अर्थात् पहले अन्न, फिर फल-दूध, फिर छाछ- पानी का त्याग करते हुए शरीर का त्याग किया जाता है। समाधि पूर्णतः एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसे धारण करने वाला व्यक्ति एक-दो या सात-आठ भव में मोक्ष प्राप्त कर सकता है। समाधि जिनके निर्देशन में होती है उन्हें ‘निर्यापक’ कहते हैं। निर्यापक को सम्पूर्ण ज्ञान होना चाहिए, जिससे वह समाधि धारण करने वाले ‘क्षपक’ को उत्कृष्ट समाधि करवा सके। सम्मलेन की आयोजन समिति के संयोजक डॉ. रनबीर सिंह (कुलपति नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी), डॉ. स्टेफनी डायजोक्स (निदेशक जर्मन फ्रांस लॉ केरिकुलम), डॉ. टिलमन बेजेनबरगर (यूनीवर्सिटैट पोट्सडैम, जर्मनी), और विशेष रूप से डॉ. प्रसन्नान्शु (निदेशक- भाषाई न्याय और लुप्त भाषा केंद्र एवं कांफ्रेंस निदेशक) ने आचार्य श्री ज्ञानसागर जी के प्रति उक्त मार्गदर्शन के लिए विनयांजलि समर्पित की तत्पश्चात् ज्ञानसागर युवा संघ (रजि.) की ओर से श्री योगेश जैन, श्री अनिल जैन एवं श्री मनीष जैन द्वारा सभी प्रमुख निदेशको एवं वक्ताओं को प्रतीक चिन्ह से सम्मानित कर आभार व्यक्त किया गया।

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