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फिल्म रिव्यू : थप्पड़ मुझे मारा पहली बार… नहीं मार सकता…

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के. कुमार

फिल्म : थप्पड़।

कलाकार : तापसी पन्नू, पावेल गुलाटी, कुमुद मिश्रा, रत्ना पाठक, मानव कौल, दीया मिर्जा, माया सराओ, राम कपूर।

निर्देशक : अनुभव सिन्हा।

निर्माता : अनुभव सिन्हा, भूषण कुमार।

रेटिंग : ***

स्त्री की स्वतंत्रता, उसके आत्मसम्मान, उसकी संवेदनशीलता, उसके समर्पण और त्याग को कोई अपना और तो और यदि उसका जीवनसाथी ही नहीं समझे तो उस स्त्री के मन और दिलो-दिमाग पर क्या गुजरेगी? एक स्त्री जो पढ़ी-लिखी है, एक संपन्न परिवार में ब्याही गई है, किसी बात की कोई कमी नहीं, सिर्फ और सिर्फ रहना चाहती है, अपने सम्मान और अपने और परिवार की खुशी के लिए। असल में हम बात कर रहे हैं, अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित फिल्म ‘थप्पड़’ की, जो अलग-अलग महिलाओं के जीवन पर केंद्रित है।

कहानी कुछ यूं आगे बढ़ती है, रोजमर्रा की जिंदगी के शैड्यूल में व्यस्त अमृता (तापसी पन्नू) अपने पति विक्रम (पवैल गुलाटी) के साथ खुशनुमा जिंदगी में मस्त है, लेकिन उसका पति विक्रम अपने करियर को लेकर इतना उत्साहित है कि दिल्ली से वह लंदन शिफ्ट होना चाहता है, जिसके चलते वह परिवार के लोगों की संदेनशीलता को भी दरकिनार करने का गुरेज नहीं करता, लेकिन उसकी पत्नी अमृता दोनों के जीवन में हर खुशी चाहती है। असल में विक्रम के प्रमोशन और लंदन जाने की खुशी में उसके घर एक पार्टी का आयोजन किया जाता है। तभी पार्टी के दौरान उसके बोस का फोन आता है, कि आप लंदन तो जाओगे लेकिन बोस बनकर नहीं, अपने बोस के अंडर काम करोगे। बस क्या था फिर विक्रम अपना आपा खो देता है, और अपने आॅफिस के एक सीनियर से झगड़े के दौरान बीच बचाव करती अमृता को एक थप्पड़ जड़ देता है, जिसके बाद संवेदनशील अमृता के अंतर्मन में एक भूचाल सा आ जाता है, और वह गुमसुम रहने लगती है, मानो उसकी जिंदगी की सभी खुशियां छिन गई हों। ऐसे में वह रोमर्रा के काम तो करती है, लेकिन पहले की तरह नहीं, वह व्यक्तिगत रूप से तो घर में उपस्थित है, लेकिन उसका अंतर्मन से वह वहां उपस्थित नहीं हैं। उसके दिलों-दिमाग में एक अजीब सी हलचल चलती रहती है। इसी पशोपेश में वह एक दिन अपने घर चली आती है, जहां उसकी मां (रत्ना पाठक) और उसकी सास (तन्वी आजमी) यह समझाते हैं, कि बेटा घर में ये छोटी-छोटी बातें तो होती रहती हैं, तो सहन करना चाहिए, इन बातों का इतना गंभीरता से नहीं लेना चाहिए।

लेकिन अमृता किसी की नहीं सुनती उसके आत्म-सम्मान को गहरी ठेंस पहुंची है, उसके अंदर जो तड़प और दुख है, वह किसी को नहीं दिख रहा है, जिसके चलते वह कुछ फैसला नहीं ले पाती। और विक्रम के घर बुलाने के बाद भी वह नहीं जाती, जिसके बाद विक्रम उसको कानूनी नोटिस भेजाता है, तब वह अमृता एक नामी वकील नेत्रा (माया सराओ) के पास जाकर अपनी व्यथा बताती है, लेकिन नेत्रा भी यही कहती है, कि तुम घर जाकर समझौता कर लो। लेकिन अमृता अपने दिल की सुनती है, या नहीं, या उसके जो सही लगता है, वह करती है या नहीं। अब कहानी का आगे का सार यह है कि क्या वह अपने पति से समझौता करती है, या नहीं या वह समाज और अपने घरवालों का ख्याल रखते हुए अपने फैसले पर अटल रहती है या नहीं, यही फिल्म की आगे कही कहानी है।

यहां फिल्म की कहानी में एक बात और देखने को मिलती है कि फिल्म में कई स्त्रियों की अंतरव्यथा की कहानी चल रही हैं, एक तो प्रमुख अमृता की, वहीं दूसरी उसके घर में काम करने वाली एक नौकरानी की, तीसरे नामी वकील अमृता कि चैथे अमृता के पड़ोस में रहने वाली दिया मिर्जा की, साथ ही उसकी मां रत्ना पाठक और सास तन्वी आजमी और उसकी भाभी नयेला गरेवाल की। यहां फिल्म अलग-अलग स्त्रियों के जीवन की व्यथा को भी दर्शाया गया है।

अब बात किरदारों के अभिनय की करें तो तापसी अमृता के किरदार में अपनी सहज और सरल छवि में अभिनय करती दिखती हैं, उनके द्वारा बोले गए डाॅयलाॅग ‘उसने मुझे मारा पहली बार…. नहीं, मार सकता’, और ‘वो चीज जिसे जोड़ना पड़े मतलब वह टूटी हुई है’ मन को अंदर तक छूते हैं। वहीं पवैल गुलाटी ने एक पति के रूप में अपने किरदार में जमे हैं। दूसरी और कुमुद मिश्रा, नीना गुलाटी, तान्वी आजमी, दिया मिर्जा अन्य किरदार भी अपने अभिनय में रचे-बसे हैं। गानों की अगर बात करें तो ‘एक टुकड़ा धूप का’ मन के उद्वेलन को व्यक्त करता है।

अनुभव सिन्हा की यह फिल्म समाज में रह रही स्त्रियों चाहे वह संपन्न है या फिर गरीब सभी पर किसी न किसी तरह से परिवार और अपने लोगों को जो बोझ और दुख होता है, जिसके चलते वह वह हिंसा सहने और घुट-घुटकर जीवन बीताने को मजबूर होती है, दिखाया गया है, वहीं इसके उलट समाज में रह रहीं अमृत जैसी महिलाएं भी हैं, जो अपने आत्मसम्मान के लिए कुछ भी खोने के डर से दृढ़ता से सामना करती हैं। अब दर्शकों को समाज और परिवार से जुड़ी एक गंभीर मुद्दे से रू-ब-रू कराती और पारिवारिक रिश्तों की सीख देती फिल्म को देखना है, तो वह ‘थप्पड़’ को जरूर जा कर देखें।

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