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जिएं जिदंगी का हर रंग

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  • प्रस्तुति : पूनम जैन–

सुख के हजार रंग हैं, तो दुख के भी। रंग जितने पक्के, उतने कच्चे भी। सब पर न एक से खिलते हैं, न टिकते हैं। अंधेरे में जो तस्वीर दिखती है, असल में कुछ और ही होती है। हमारी अपनी उम्मीदों से घुलकर हर रंग बदल जाता है। प्यार और भरोसे की रोशनी में हर रंग चमक उठता है।

जमीन से आसमान में उड़ती किंगफिशर दूसरी चिड़िया कीत रह ही लगती है। पर जब वहीं पास की किसी डाल पर बैठी हो! ब्रबस ही मंुह से निकल उठता है-क्या रंग हैं? हमारी आंखें पास के ही रंग देख पाती हैं। दूर के रंग देखने के लिए वाइड एंगल लैंस की जरूरत होती है। जिंदगी लाखो रंगों से भी है, हमें दिखते केवल पास के ही हैं। एक सुख या दुख हरेक पर एक सा असर नहीं करता। यह तय होता है, हम चीजों को किस जगह से और किस रेाशनी में देख रहे हैं। उम्मीद बड़ी कार की थी, छोटी मिली तो मिलने के बाद भी खुशी अधूरी ही रहेगी। उम्मीदा मोटर साइकिल की थी और कार छोटी भी मिल गई तो खुशी दोगुनी हो जाएगी। सोच हा यही चश्मा हमें रंग दिखाता है और कई रंगों से दूर भी करता है।

रंग विज्ञान कहता है कि सभी रंगों को मिला देने पर सफेद रंग बनता है। रोषनी चीजों पर पड़ती है तो रंग दिखते हैं। कोई वस्तु उस रंग की दिखती है, जिस रंग को वो रिफ्लेक्ट करती है। लाल फूल, रेाशनी के लाल रंग को छोड़कर बाकी रंग सोख लेता है। हरी घास, हरा रंग छोड़कर बाकी रंग ले लेती है। ंिदगी में भी जो ऊपर दिखता है, उससे कहीं अधिक रंग भीतर होते हैं। जब लगे कि हम किसी एक रंग पर अटक गए हैं तो समझ जाएं कि अब कुछ और रंगों को पकड़ने का समय आ गया है। फिल्म ‘द स्काई इज पिंक’ में ड्राइंग टीचर से डांट खाकर लौटे अपने बच्चे से प्रियंका चोपड़ा कहती है कि आसमान तुम्हारा है और वह गुलाबी भी हो सकता है।

हमारे कैनवस पर वो रंग होने चाहिए, जो हमें पसंद हैं। वो रंग दूसरों को मिलते-जुलते भी हो सकते हैं और उनसे अलग भी। एग्जीक्यूटिव कोच पीटेक कबैक्सी कहती हैं, ‘केवल सुेदर और काले रंग में चीजों को देखने का मतलब है कि हम अपने दिमाग का पूरा इस्तेमाल नहंी कर रहे हैं।’ दिमाग, एक तरह से कैमरे का लैंस है, जिससे हम किसी बात के कई पक्ष देख पाते हैं। सही फोकस बनाए रखते हुए बेहतर एंगल चुन सकते हैं। सवाल लैंस की पावर का है, जो हमारी विकास यात्रा से तय होता है। हम कहां हैं ओर अब तक क्या सीखा है? इसी से लैंस की रेंज बनती चली जाती है।

मनोविज्ञान कहता है कि हम नेगेटिव चीजों की ओर तेजी से बढ़ते हैं। अच्छे विचार की तुलना में बुरा विचार तेजी से फैलता भी है। यही कारण है कि सुख को हम भूल जाते हैं और दुख को देर तक पकड़े रहते हैं। कड़वी यादों की वायरिंग इतनी घनी हो जाती है कि हम बार7बार-घूम-फिरकर किसी बंद गली की ओर चले जाते हैं। किसी एक अचदे विचार को अपनाने के लिए हमें तकरीबन पांच बुरे विचारों को हटाना पड़ता है, तब जाकर किसी एक अचदे विचार की दिमाग में जगह बन पाती है। ‘आर वी हार्डवायर्ड टु बी पाॅजिटिव और नेगेटिव’ लेख में रे विलियम्स कहते हैं, ‘बड़ी बारकी से हम दिमाग की नेगेटिववायरिंग करते चले जाते हैं। अच्छे पलों में बुरी या बेकार की बातें पर सोचते हैं और फिर शिकायत करते हैं कि जीवन इतना जटिल क्यों है।

हर दिन सूरज उगता है और ढलता है तब भी वह दृश्य हर दिन अलग होता है। प्रकृति सहज ही एक दिन में कितने रंग बदलती है। हालात मुश्किल हों तो भी तय है कि एक से नहीं रहेंगें। दुख और दर्द का कोई रंग स्थायी नहीं होता। खुद कुछ नहीं सूझ रहा, कुछ नहीं कर पा रहे तो भी जो पास है, उसे सहेजते हुए रोशनी का इतंजार करें। रंगों को खुद से जुड़ते हुए दखें। ऐसे ही पलों के लिए रविंद्र नाथ ठाकुर ने कहा होगा, ‘मेरी जिंदगी में बादल घिरते रहते हैं। अ बवे बारिष और तूूफान नहीं लाते, मेरे सूर्यास्त में अपने रंग जोड़ देते हैं।

हालात से बचने और डरने से कुछ हासिल नहंी होता। दूसरों की खुशियों की देखा-देखी करने से भी कुछ नहीं होता। हमें अपने रंगों को जीना होता है। जबर्दस्ती ओढ़े हुए रंग देर तक नहीं टिकते। डरा-धमका कर या झांसे में रखकर दूसरों को चढ़ाए रंग भी उतर ही जाते हैं। रंग खिलते नहीं, बदरंग हो जाते हैं। अंत में रंगो तो रंगने भी दो। खेलों तो खेलने भी दो। अपना हर रंग जीना है तो दूसरों को उनके रंग जीने दो। साभार: एचटी

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