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‘इस्सयोग’ के प्रवर्त्तक और युगावतार थे महात्मा सुशील

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  • विनोद तकिया वाला

इस्सयोग‘ के रूप में एक दिव्य और चमत्कारिक किंतु अत्यंत सहज साधनापद्धति प्रदान करने वाले ब्रह्मलीन संत महात्मा सुशील कुमार ने मानव संसार को गुणवत्तापूर्ण और मूल्यवान जीवन जीने की विस्मित करने वाली शिक्षा दी। उन्होंने वह सहज मार्ग प्रशस्त किया जिससे कि गृहस्थजीवन में भी आत्मिक उन्नति की जा सकती है और इसके लिएतनमन को कष्ट देने वाले किसी दुरूह तप या हठयोग की आवश्यकता नही है। उन्होंने प्रेम के महान पाँचवे पुरुषार्थ पर बल दिया और कहा कि निष्ठापूर्वक अपने सभी कर्म करते हुएसद्ग़ुरु की कृपा प्राप्त कर इस्सयोग‘ की सहज साधनापद्धति अपनाकर अपना इहलोक और परलोक दोनों ही सुधारा जा सकता है।गृहस्थजीवन में भी ब्रह्मसाक्षात्कार संभव है। यह प्रत्येक श्रद्धावान जिज्ञासु की पहुँच के भीतर है। महात्मा जी इस युग के अवतारी पुरुष थे। उन्होंने इस्सयोग‘ के रूप में ब्रह्मप्राप्ति और सभी प्रकार के रोगों से मुक्ति का महान मार्ग प्रशस्त किया। 

इस युग के इस विलक्षण संत का जन्म बिहार प्रांत के भोजपुर ज़िला निवासी ब्रहमलीन महापुरुष श्रीयुत श्रीशचंद्र शास्त्री एवं पुण्यश्लोक़ा कर्पूर कमला के एक मात्र पुत्र के रूप में १३ जुलाई १९३८ को हुआ था। आपको अध्यात्म विरासत में मिला था। आपके पिता प्रातः स्मरणीय शास्त्री जी चारों वेदों के ज्ञाता और विद्वान भाष्यकार थे। वे कठोर कर्मकांडी और सपत्नी पक्के आर्य समाजी थे। आर्य समाज के आचार्य के रूप मेंउनकी समाज में बड़ी प्रतिष्ठा थी तथा वे भारत सरकार की ओर से विदेशों में थाईलैंडश्रीलंका आदि देशों में संस्कृत एवं वेदों की शिक्षा देने हेतु सादर भेजे जाते थे।

शास्त्री जी ने गर्भाधान से लेकर महात्मा जी के आगे के सभी संस्कार वेदोक्त विधि से कराए थे। उनकी माता पूजनीयाँ कर्पूर कमला जीसामाजिक सरोकारों से जुड़ीं विदुषी और तेजस्वीनी महिला थीं। अस्तु बाल्य काल से हींमहात्मा जी में आध्यात्मिक संस्कार पड़ने लगे थे। शिशु पर वैदिक संस्कार पड़ेइस हेतुपिताश्री किंचित लोभ देकर गायत्री मंत्र आदि रटाते थे। शास्त्री जी ने उन्हें कह रखा था किजबगायत्रीमंत्र‘ का पाठ किया जाता हैतो सभी इच्छित फल प्राप्त होते हैं। उन्हें किसी वस्तु की इच्छा होती थीतो उनसे यह कहा जाता था कि, “आँखों को बंद कर गायत्री मंत्र‘ का जप करोतुम्हें वह अवश्य प्राप्त होगा।” महात्मा जी तदनुसार करते थेफिर उनके हाथों में वह वस्तु पड़ी मिलती। इच्छित वस्तु पिताश्री तैयार रखा करते थे।)

वयस्क होने पर महात्मा जी में स्वतंत्र विचार आने लगे तथा उनका आध्यात्मिकचिंतन बदलने और परिष्कृत होने लगा। वय और अनुभूतियों के बढ़ने के साथसाथ , ‘परमतत्त्व‘ की खोज की अभिलाषा उत्कंठा बनती गयी और उन्होंने जीवन के कर्मों का निबटारा करते हुए सत्य की खोज‘ जारी रखी।

आपकी शिक्षादीक्षा भी निष्ठा से हुई तथा आपने १९६१ में बी एस सी इंजीनियरिंग (सिविलकी उपाधि प्राप्त की। अस्तु अपनी लौकिक वृति १९६३ में बिहार सरकार के लोक निर्माण विभाग में अवर प्रमंडल अभियंता के पद से प्रारम्भ की। १९६३ से ६५ तक आप बिहार शरीफ़ में रहे तथा १९६६ से ६९ तक राँची में । तब बिहार का विभाजन नही हुआ था। १९७०७१ के बीच आपनेपटनाहाजीपुर को जोड़ने के लिए बनाए जा रहे गंगा सेतु (महात्मा गाँधी सेतुके निर्माण में निर्माताकंपनी गैमन इंडिया‘ के साथ अपना विशेष योगदान दिया था। वर्ष १९७२ से ७४ तक बोकारो में एच एस सी एल में ज़ोनल इंजीनियर के पद पर सेवा दी। इस काल का उल्लेखनीय पक्ष यह था कि आप हीं के नेतृत्व में अत्यंत महत्वाकांक्षी कोल्ड रोलिंग मिल की कमीशनीग‘ संपन्न हुई थी। इसके बाद से१९७९ तक आपने राजधानी (पटनाके विभिन्न कार्यप्रक्षेत्रों मेंअपना उल्लेखनीय योगदान दिया। इसके बाद आपकोआपके कुशल प्रशासनिक और प्रभावकारी व्यक्तित्व के महत्त्व को रेखांकित करते हुए आपको नक्सल प्रभावित उन क्षेत्रों में विशेष कार्यों के लिए भेजा गयाजहाँ से दूसरे अधिकारी और विशेषज्ञ परहेज़ रखना चाहते थे। लेकिन आप भला किससे भय रखते!  आपने सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर अपने कर्तव्य पूरे किए तथा इस दौरान अनेक स्थानों पर हरिजनछात्रावास एवं शैक्षणिक संस्थानों के निर्माण सहित विभिन्न विकास कार्यों को पूरा किया। १९९८ में अपने विभाग के अध्यक्ष पद से सेवा निवृत होने से पहले आपने पटना क्षेत्रीय प्राधिकार के ट्रिब्यूनल में अपनी सेवाएँ दी। पटना में अतिक्रमण हटाने हेतु न्यायिक फ़ैसले लेने के लिए दो माननीय न्यायाधीशों के साथ आपकी अभियुक्ति औरर अनुशंसा महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी। पटना के सौंदर्यीकरण के लिए भी आपके प्रयास सराहनीय रहे।

उपरोक्त कुछ संदर्भ इस आशय के लिएलिए गए कियह प्रमाणित हो कि महात्मा जीजो कहते थेवह अपने जीवन में पालन भी करते थे। उन्होंने संसार को पूरा जियाऔर वहीं पूरी तरह विरक्त भी रहे। आध्यात्मिक धारा में बहते हुए भीसंसार छोड़ने की बात कभी नहीं की। वे कहा करते थे किसत्य की खोज और तत्त्वज्ञान के लिए संसार को छोड़ना आवश्यक नही है। सच्चा मार्ग और सच्चा गुरु पाकर गृहस्थ जीवन में हीं आध्यात्मिक उपलब्धियाँ पायी जा सकती है। गृहस्थआश्रम साधना का श्रेष्ठ आश्रम है।

इसी तरह उन्होंनेसमय आने पर विवाह भी किया। वर्ष १९६३ के १८ मई को जब आपका विवाह संपन्न हुआउस समय आपकी नवपरिणीता आदरणीया विजया जी माँ विजया जीकी इंटर की परीक्षा संपन्न हुई थी। भविष्य में दिव्य शक्तियों के स्वामी होने वाले सुंदरसफल और योग्य पुरुष के लिएनिश्चय हींसुयोग्य कन्या होनी चाहिए। कहते हैं– जोड़ियाँ ऊपर बनायी जाती है। औरों के बारे में तो नहीं कह सकते,किंतु आपकी जोड़ी शिवपार्वती‘ की जोड़ी सिद्ध हुई। माताजी बाल्यकाल से हीं आध्यात्मिक रुझान रखती थी। संभवतः दोनों के संगम की पृष्ठभूमि पहले से तैयार हो रही थी। सो स्वाभाविक रूप से दोनों ही अध्यात्म के पथ पर भी साथसाथ बढ़े। ईश्वर के प्रति उनकी विपुल भक्ति ने निश्चय हीं प्रभु को अपनी ओर खींचा था। इसीलिए उन्हें बाल्यकाल से हीं अलौकिक अनुभूतियाँ होती थी।

साधना के मार्ग में एक पथप्रदर्शक की आवश्यकता पड़ती है। एक महात्मा ने दोनों को दीक्षा भी दी तथा साधना का मार्ग भी बताया। किंतु कुछ हीं कालों में आपने यह अनुभव किया कियदाकदा गुरु रूप में कोई ऐसा विलक्षण व्यक्तित्व आता हैऔर आप दोनों को अलौकिक स्थितियों में ले जाता हैजैसा किआपके लौकिकगुरु नहीं कर सकते थे। बाद में आपने अनुभूत किया किलौकिकगुरु के रूप में स्वयं सद्ग़ुरु भगवान शंकर आकर साधना का मार्ग प्रशस्त करते हैं। कालांतर मेंभगवान शिव स्वयं प्रकट होने लगे और आपने अध्यात्म की वह ऊँचाई पायीजिसके लिए युगोंयुगों तकजनमोंजनम तक प्राणी भटकता फिरता है।

महात्मा जी तथा माताजी ने केवल स्वयं हीं उस परम तत्त्व को नहीं प्राप्त कियाबल्कि उन्होंने जिज्ञासु पात्रों एवं जनसाधारण को भी प्रभु से सीधे जुड़ने का, ‘इस्सयोग‘ के रूप में एक महान और सरल मार्ग प्रशस्त किया। इस साधनापद्धति का आश्रय लेकर सामान्य साधक भीसहज में हीं वह सहजावस्था प्राप्त करने लगता हैजिसके लिए बड़ेबड़े संत अपना जीवन खपाते रहे हैं। अपनी शक्तियों से शक्तिपातदीक्षा‘ (कुंडिलिनीजागरणदेने के साथसाथ वे साधकसाधिकाओं को साधना की एक ऐसी सहज प्रक्रिया बताते थेजो घर बैठे गृहस्थ स्त्रीपुरुषों द्वारा किया जा सकता है। महात्मा जी इस्सयोग‘ को न भूतों न भविषयति आध्यात्मिक क्रांति‘ कहा करते थे।

आपका साहित्यिक अवदान भी अत्यंत मूल्यवान है। आपने,माँ विजया जी के संगइस्सयोग और अध्यात्म पर केंद्रित एक अत्यंत मूल्यवान ग्रंथ ब्रह्मप्राप्ति और रोगमुक्ति में इस्सयोग‘ का भी प्रणयन किया। इस पुस्तक के अंग्रेज़ी अनुवाद इस्सयोगा:गौड रियलाइज़ेशन ऐंड ऐटेनमेंट औफ़ ब्लिस्स‘ का प्रकाशन भी बहुत प्रांजल साहित्यिक भाषा में हुआ है। दोनों ही पुस्तकों में केवल सूचनाएँ एवं विचार ही नहीअपितु सुंदर भाषागत साहित्य भी है। इन पुस्तकों कोइस्सयोगीगण गुरुग्रंथ साहिब‘ की भाँति पूज्य और पठनीय मानते हैं। अध्यात्म में रुचि रखने वाले सुधी पाठकों के लिए यह पुस्तक अत्यंत नूतन और विज्ञानसिद्ध सामग्री उपलब्ध कराती है। यह संपूर्ण आध्यात्मिकसाहित्य को समझने की एक नई दृष्टि भी प्रदान करती है। 

वर्ष २००२ के २३२४ अप्रैल की मध्यरात्रि में महात्मा जी ने अपने लौकिकदेह का त्याग किया। इसके एकदो वर्ष पूर्व से हीं वे अपने महाप्रयाण के संकेत देने शुरू कर दिए थे। वे गुरुधाम बी१०८कंकड़बाग हाउसिंग कौलोनी पटनामें प्रत्येक संध्या २३ घंटे का समय साधकसाधिकाओं को देते थे। संध्या ६ बजे से भजनकीर्तनफिर पौने आठ बजे सेजगतकल्याण हेतु, ‘ब्रह्मांडसाधना‘ और उसके पश्चात आशीर्वचनयह प्रतिदिन का नियम था। माताजी के साथ महात्मा जी आसान पर विराजते थे तथा साधकगण की समस्याएँ सुनते और निराकरण करते थे। प्रायः हीं कुछ न कुछ नए लोगभाँतिभाँति की समस्या लेकर आते और निदान पाते। महात्माजी सबके कष्ट हरा करते थे। अपने महाप्रयाण के कुछ दिन पहले से वे यह कहने लगे थे कि, – “अब आप में से साधकसाधिकाओं में सेअनेक उस उच्चावस्था को प्राप्त कर चुके हैंजिसके आगे की यात्रा के लिए आप समर्थ हैं तथा कालांतर में आप में से अनेक इस्सयोग‘ को आगे बढ़ाने का कार्य करेंगेजिससे ईश्वर से सीधा संपर्क‘ का यह मार्ग आगे भी मानवसमुदाय को मिलता रहेगा

अंततः २३२४ अप्रैल की मध्यरात्रि में आपने मुद्रा लगाकर समाधि ले ली तथा अपने सभी प्राणों पाँच प्रकार के प्राण माने जाते हैको खींच कर कुटस्थ होते हुएसहस्रार के मार्ग से परबिंदु‘ का भेदन करते हुएब्रह्म लीन हो गए। अपना पार्थिवशरीर त्याग दिया। इस्सयोग के साधक यह मानते है किमहात्मा जी ने पार्थिवदेह का त्याग करसूक्ष्म रूप से निखिल ब्रह्मांड में व्याप्त हो गए हैं तथा अपने साधकसाधिकाओं के साथसूक्ष्म रूप में सदैव बने रहते हैं। उनका यह भी मानना है किवे सूक्ष्म रूप से माताजी में (माँ विजया जी के तन मेंउपस्थित रहते हैं तथा उनके माध्यम से आज भी जगत का कल्याण कर रहे हैं। महानिर्वाणदिवस पर अशेष श्रद्धातर्पण !

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