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आपातकाल 1975 स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र की पहली लड़ाई

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  • महेश चन्द्र शर्मा (पूर्व महापौर)

25 जून 1975 को लगाए गए आपातकाल के 46वें वर्ष पर विशेष

12 जून 1975 इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया, इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द हुआ, उसी दिन गुजरात के चुनावों में कांग्रेस हार गई। चिमन भाई पटेल की भ्रष्ट सरकार चली गई। उसी समय (74-75) में श्री जय प्रकाश नारायण का आगमन हुआ। गुजरात छात्र आंदोलन मौरवी इंजीनियरिंग काॅलेज से प्रारंभ हुआ, भोजन को लेकर चिमन भाई पटेल की सरकार के खिलाफ नवनिर्माण समिति बनी (7 फरवरी 1974) को 42 मरे 108 घायल हुए।

बिहार छात्र आंदोलन, विद्यार्थी परिषद् द्वारा प्रारंभ हुआ, अन्य छात्र संगठन भी कूद पड़े। 17, 18 नवम्बर छात्र नेता पूरे बिहार और आसपास से आए, आगे आंदोलन चलाने के लिए 12 लोगों की टीम बनी, छात्र संघर्ष समिति बनी, पूरे बिहार में आंदोलन, श्री राम बहादुर राय, श्री गोविन्दाचार्य विद्यार्थी परिषद् के नेता जय प्रकाश जी को मिलने आए और उनसे गोविन्दाचार्य आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए कहा। उन्होंने नेतृत्व स्वीकार करने के लिए शर्त रखी कि आंदोलन अहिंसक रहेगा। छात्रों का एक वर्ष बर्बाद हुआ 100 से अधिक मरे, 500 घायल हुए, 24000 गिरफ्तार हुए। 4, 5 नवम्बर को विशाल सम्मेलन हुआ।

25 जून 1975 रामलीला मैदान में विशाल रैली हुई, जयप्रकाश जी बहुत प्रसन्न हुए, नाना जी देशमुख ने 29 जून से सरकार का विरोध व इंदिरा गांधी का त्यागपत्र मांगने हेतु आंदोलन प्रारंभ करने की घोषणा की। इसी बीच इंदिरा गांधी ने 12 जून 1975 को चुनाव पिटीशन में हारने के बाद 25 जून रात्रि, आपातकाल घोषित किया। 26 जून, राष्ट्रीय स्वयं-सेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। 4 जुलाई तक कुल गिरफ्तारी 1 लाख 46 हजार हुई।

संघ कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी 1 लाख 10 हजार। भ्रष्टाचार, बेईमानी घोटाले, रोज संसद में हंगामा, अखबारों में विरोधी प्रचार, प्रशासन निष्क्रिय, नागरवाला कांड, तुलमोहन राम कांड, मारुति कांड, पांडिचेरी लाइसेंस काण्ड, जयन्ती शिपिंग कंपनी घपला महंगाई व आपस में लड़ाई, ये सब उस समय का दृश्य था। जनता त्रस्त थी इसलिए इंदिरा गांधी के खिलाफ पूरे देश में जनता का असंतोष आंदोलन के रूप में फूट पड़ा था।

सरकार घबरा गई। 25 जून रात्रि को बड़े-बड़े नेताओं की गिरफ्तारी शुरू की गई। इंदिरा गांधी व सिद्धार्थ शंकर रे ने रात को ही राष्ट्रपति के पास जाकर इमरजेंसी पर हस्ताक्षर करा लिए। जून 26 को आपातकाल घोषित हुआ। न्यायालय को पंगु बना दिया, अखबारों पर सेंसर लगाया, परिवार नियोजन कर अत्याचार किया, 20 सूत्रीय कार्यक्रम का ढिंढोरा पीटा गया, टी.वी. व रेडियो का दुरूपयोग किया।

जयप्रकाश जी, मोरारजी देसाई, अटल जी, आडवाणी जी, चै. चरण सिंह, देवीलाल जी, शंकर, अशोक मेहता सब जेल में। सर संघचालक मा. बाला साहेब देवरस तथा संघ के कई हजार कार्यकर्ता जेल में। संघ सहित 26 संस्थाओं पर प्रतिबंध लगा। पहला सत्याग्रह 29 जून चांदनी चैक में हुआ। 21 जुलाई को लाला हंसराज जी का सत्याग्रह। सब पार्टियाँ घबरा गईं, संपर्क सूत्र टूट गए। नेता जेल में, अखबारों पर सेंसर। सभी दिशाओं में सब पर हमला।

इंदिरा जानती थी अखबारों पर सेंसर, सभी बड़े नेता जेल में अर्थात, सभी पार्टियाँ लगभग समाप्त हो जाएँगी। वह संघ की ताकत को जानती थी, इससे डर भी था, सबकी दृष्टि संघ की ओर। जे.पी. ने गिरफ्तार होते ही नाना जी पर भार डाला, किसी ने भी विरोध नहीं किया नाना जी के बाद भी सबने कहा अगला सचिव भी संघ का हो पर संघ ने रविन्द्र शर्मा को बनवाया, उन्होंने सबको कहा मैं सबसे पहले संघ से सलाह करूँगा। संघ से आज्ञा मिल गई।

दिल्ली में संघ, जनसंघ के अनेक अधिकारियों को पहले दिन से ही जेलों में डाल दिया। री केदारनाथ साहनी, श्री ईश्वरदास महाजन, श्री मदनलाल खुराना आदि उनके हाथ नहीं आये, श्री साहनी जी के जिम्मे विदेश विभाग का काम दिया। खुराना जी को दिल्ली की कमान सौंपी। श्री धनराज ओझा उनके सहायक बनाए। एक साप्ताहिक पत्रिका घर-घर छापकर भ्ेजी जाने लगी। मिलने के स्थान श्मशान घाट या मन्दिर तय किए गए।

करोल बाग की स्थिति भी इसी तरह धनराज जी ओझा की देखरेख में चली, क्योंकि श्री रूप चन्द गुप्ता-संतनगर, श्री जयप्रकाश गुप्ता -कर्मपुरा, श्री दिनेश शर्मा, बलजीत नगर, श्री प्रभुदयाल सचदेवा-पटेल नगर, श्री महेश चन्द्र शर्मा-किशन गंज, श्री मोती लाल सोढी-रामनगर, श्री प्रदीप धुप्पड़-पटेल नगर, श्री विजय भाटिया-पटेल नगर, श्री रामस्वरूप शर्मा, रैगरपुरा, श्री पी.सी. अग्रवाल-23/बी/4, रैगर पुरा, श्री मदन लाल कथूरिया टेलर-रामजस रोड़, श्री पिनोलिया जी-रैगर पुरा से गिरफ्तार हो चुके थे।

आपातकाल के दौरान जेल में बंद माननीय बालासाहब देरस ने इंन्दिराजी को पत्र में लिखा–”राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर सांप्रदायिकता का आरोप करने वाले भी कुछ लोग हैं। पर उनका यह आरोप भी निराधार है यद्यपि संघ का कार्यक्षेत्र संप्रति केवल हिन्दू समाज तक ही सीमित है, फिर भी किसी भी अहिन्दू के खिलाफ कुछ भी संघ में सिखाया नहीं जाता। संघ में मुसलमानों से द्वेष करना सिखाया जाता है, यह कहना भी सर्वथा असत्य है। इस्लाम धर्म, मुहम्मद पैगम्बर, कुरान तथा ईसाई धर्म, ईसा मसीह, बाइबिल इनके संबंध में संघ में अनुचित शब्द का भी प्रयोग नहीं होता। इतना ही नहीं बल्कि ‘सर्व धर्म समभाव’ यानी ‘एकंसद् विप्राः बहुधा वदन्ति’-यह जो हिन्दुओं की विशेषता है, उसी को संघ सर्वोपरि मानता है। सबको अपनी उपासना-पद्धति की स्वतंत्रता रहे, ऐसी ही संघ की धारणा है। मुसलमान, ईसाई, पारसी आदि अन्याय धर्मी लोगों से संघ के अनेक स्वयंसेवकों के अच्छे आत्मीयतापूर्ण संबंध हैं।”

हिन्दू-समाज एवं अहिन्दू समाज की सामाजिक समस्याएँ भिन्न हैं। अतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपना कार्य हिंदू समाज तक ही मर्यादित रखा है। हिन्दुओं में जाति भेद, पंथ भेद और अन्य कारणों से जो उच्चनीचता, परस्पर विरोध एवं अलगाव की भावना पैदा हो गई है, उसका निर्मूलन कर सारे हिंदू समाज को एकात्म संगठित करने का संघ का प्रयत्न है। इस कार्य की अत्यंतिक आवश्यकता आपको भी मंजूर होगी। सांप्रदायिक वा जातीय समझा जाने जैसा संघ का स्वरूप नहीं है, यह इससे विदित हो सकता है।

आज से 44 वर्ष पहले 25 जून को आपातकाल लागू हुआ था। भारतीय लोकतंत्र और स्वतंत्र भारत के इतिहास में आपातकाल ऐसा काल है जो लोकतंत्र पर धब्बा है। मेरा दृढ़ मत है कि भविष्य में यदि कभी देश की आजादी और लोकतंत्र में कोई खतरा उत्पन्न हुआ तो लोकतंत्र के इन प्रहरियों का संघर्ष लोगों को प्रेरणा देगा। मेरा यह भी मानना है कि मीसा कानून में निरूद्ध लोगों के त्याग और तपस्या की क्षतिपूर्ति को ही नहीं सकती। आज अनेक मीसाबंदियों की इस जिद, जुनून और जज्बे को नमन भी करता हूँ।

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