Home खबरें जन्माष्टमी विशेष : मानवी पूर्णता के आदर्श श्रीकृष्ण

जन्माष्टमी विशेष : मानवी पूर्णता के आदर्श श्रीकृष्ण

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वासुदेव शरण अग्रवाल#

महाभारत में हमें कृष्ण का परिचय एक विशिष्ट रूप में मिलता है। यादव क्षत्रियों की दो प्रधान शाखाएं अंधक और वृष्णिसंज्ञक थीं। कृष्ण वृष्णि वंश के थे। अक्रूर अंधक थे। वृष्णि गणराज्य की ऐतिहासिक सत्ता का प्रमाण प्राचीन सिक्कों से प्राप्त होता है, जिस पर ‘वृष्णि राजन्यगणस्य त्रातारस्य’ इस प्रकार का लेख है। इससे ज्ञात होता है कि विक्रम संवत् के प्रारंभ तक वृष्णि लोगों का शासन एक गण या संघ के रूप में था। पाणिनी की ‘अष्टाध्यायी’ और बौद्ध साहित्य में भी अंधक वृष्णियों का उल्लेख है।

कृष्ण को हमारे देश के जीवन-चरित्र लेखकों ने ‘सोलक कला का अवतार’ कहा है। इसका तात्पर्य क्या है? यह स्पष्ट है कि भिन्न-भिन्न वस्तुओं को नापने के लिए भिन्न-भिन्न परिमाणों का उपयोग किया जाता है। इसी प्रकार मानवी पूर्णता को प्रकट करने के लिए कला की नाप है। सोलह कलाओं से चंद्रमा का स्वरूप संपूर्ण होता है। मानवी आत्मा का पूर्णतम विकास भी सोलह कलाओं के द्वारा प्रकट किया जाता है। कृष्ण में सोलह कला की अभिव्यक्ति थी, अर्थात मनुष्य का मस्तिष्क मानवी विकास का जो पूर्णतम आदर्श बना सकता है, वह हमें कृष्ण में मिलता है। नृत्य, गीत, वादित्र, सौंदर्य, वाग्मिता, राजनीति, योग, अध्यात्म, ज्ञान, सबका एकत्र समवाय कृष्ण में पाया जाता है। गोदोहन से लेकर राजसूय यज्ञ में ब्राह्मणों के चरण धोने तक तथा सुदामा की मैत्री से लेकर युद्धभूमि में गीता के उपदेश तक उनकी ऊंचाई का एक पैमाना है, जिस पर सूर्य की किरणों की रंग-बिरंगी पेटी (स्पेक्ट्रम) की तरह हमें आत्मिक विकास के हर स्वरूप का दर्शन प्राप्त होता है।

कृष्ण के उच्च स्वरूप की पराकाष्ठा हमारे लिए गीता में है। सब उपनिषद यदि गौएं हैं, तो गीता उनका दूध है। इस देश के विद्वान किसी गं्रथ की प्रशंसा में इससे अधिक और क्या कह सकते थे? गीता विश्व का शास्त्र है, उसका प्रभाव मानवजाति के मस्तिष्क पर हमेशा रहेगा। संसार में जनम लेकर ममें से हर एक सामने कर्म का गंभीर प्रश्न बना ही रहता है। जीवन कर्ममय है, संसार कर्म का जीवन से क्या संबंध है और किस प्रकार उस संबंध का निपटारा करने से मनुष्य अपने अंतिम ध्येय व शांति को प्राप्त कर सकता है। इन प्रश्नों की सर्वोत्तम मीमांसा काव्य के ढंग से गीताकार ने की है।  कृष्ण भारतवपूर्ण के लिए एक अमूल्य निधि हैं। जिस युग में इंद्रप्रस्थ और द्वारका के बीच किंकिणीक रथ बलाहक, मेघपुष्प, शैव्य और सुग्रीव नामक अश्वों के साथ झनझनाता रहता था, न उस समय कृष्ण भारतवर्ष के शिरोमणि महापुरुष थे, बल्कि आज तक वे हमारी राष्ट्रीय संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि बने हुए थे।
(वासुदेव शरण अग्रवाल रचना-संचयन के लेख ‘महापुरुष श्रीकृष्ण’ का संक्षिप्त अंश) साभार : एचटी

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