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भारतीय संस्कृति में कृष्ण : जीवन के केंद्र में श्रीकृष्ण

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  • डाॅ. मयंक मुरारी

कृष्ण जीवन के केंद्र में हैं। जीवन के सृजन का हरेक बिंदु और रेखा में कृष्ण का ही रूप और आकार है। हमारी क्रिया जीवन और जगत में चलती है और उस क्रिया के मध्य में कृष्ण का वास होता है। कृष्ण की पकड़ में पूरा जीवन है। इस जगत और प्र्यावरण पर उसकी ही महिमा है। उनकी मुट्ठी में आकाष है और उनके पांव से पृथ्वी गतिमान होती है। उनके स्वर में सबको जीवन की सांस मिल रही है। उनकी अग्नि से सब तपते हैं और उनकी शीतलता में मस्त होते हैं। वही एक हैं। अनेक में एक और एक में अनेक।

कृष्ण सर्वत्र हैं। चेतना में ही नहीं, जड़ में भी। अच्छाई में भी और बुराई में भी। इतनी व्यापकता और किसी महापुरुष व देव में नहीं मिलेगी। सुखमय जीवन में सुख और दुखमय जीवन में दिशा केवल कृष्ण ही देते हैं। वे हर समय हरेक कर्म में अपनी उपस्थिति की छाप देते हैं। दो किनारों पर जैसे नदी सुरक्षित रहती है, उसी प्रकार राधा और कृष्ण रूपी किनारों के बीच रहने पर हमारा निरंतर प्रवाह बना रहता है।

लोक और शास्त्रीय जीवन में कृष्ण इस तरह संयुक्त हैं कि एक-दूसरे को पृथक करना कठिन है। कृष्ण कथा में भारतवर्ष का दर्शन होता है। इनका चरित्र भारतीय अस्मिता का आधार है। उनकी राजनीति में धर्म अपने अस्तित्व की खोज करता है। केवल कृष्ण से ही भारतीय लोकजीवन, साहित्य, संस्कृति और कला की सभी विधाओं की पहचान बनती है। कृष्ण ने जीवन को पूर्णता प्रदान की है। हमारे हरेक रूप, गुण, कर्म, ज्ञान, भक्ति और ध्यान के मार्ग पर कृष्ण की अमिट छाप मिलेगी। किसी भी मार्ग से जाएं, वह मार्ग कृष्ण का होगा। जीवन की हरेक दिशाओं की यात्रा कृष्ण में ही समाहित हैं। वे राग में हैं, प्रेम में हैं, भोग में हैं, कर्म में वहीं हैं। ज्ञान के आलोक से जब जगत प्रकाशित होता है। तो उनका गीता ही जीवन और जीवन के केंद्र में मिलती है। प्रेम और भक्ति हो, तो राधा मिलेंगीं, धर्म की बात हो, तो युधिष्ठिर खड़े मिलेंगें। कृष्ण शांति में हैं और युद्ध में भी केंद्रीय भूमिका में हैं। ज्ञान में ऊधो और कर्म में अर्जुन सब शिखर भूमिका में हैं। कृष्ण एक हैं, लेकिन अनंत की संभावना अपने अंदर समेटे हैं।

डनका व्यक्तित्व संपूर्ण भारतवर्ष पर छा गया। यह इसलिए हुआ कि कृष्ण न साधक थे, न सत्य की खोज के लिए निकले थे। उन्हें न राज्य की लालसा थी, और न ही सम्मान के प्रति कोई मोह था। जब स्वभाव में आसक्ति हो तो उससे किसी भी चीज से अपने को दूर कर पाना संभव नहीं। लेकिन कृष्ण न तो आसक्त हैं और न ही विरक्त हैं। कृष्ण वीतराग हैं। राग और विराग से परे। इसी कारण उन्होंने गीता में घोषणा की कि जगत के हरेक जीव और वस्तुओं में श्रेष्ठ रूप में उनका वास है।

कृष्ण ने इस जगत में हरेक चीज, हरेक माध्यम और हरेक कर्म के द्वारा श्रेष्ठता की प्राप्ति का बोध कराया। उन्होंने सिखाया कि जीवन में पूर्णता की प्राप्ति के कई मार्ग हैं, पर उस तक जाने के लिए पूर्ण साधना चाहिए। कृष्ण से कोई दूर रह नहीं सकता। वे स्पर्श करेंगें। वे आमंत्रण देंगें। वे विवश कर देंगें। उस युग में भी कोई कृष्ण से दूर नहीं रह सकता और उस युग के बाद भी कोई कृष्ण से दूर नहीं रह सका। मीरा के गीत में, चैतन्य के नृत्य में, सूर के शब्द में, जयदेव के भाव में कृष्ण का ही रंग है। वे मुक्त हैं और समस्त जीव की मुक्ति ही उनका लक्ष्य है। साभार : एचटी

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