Home खबरें देश में दिव्यांगता में भी दिव्यता की संस्कृति रही है – प्रो. विक्रम सिंह

देश में दिव्यांगता में भी दिव्यता की संस्कृति रही है – प्रो. विक्रम सिंह

6 second read
0
1
69

‘’हमारे देश में प्राचीन काल से ही दिव्यांगता में दिव्यता की संस्कृति रही है। सूरदास से लेकर अष्टावक्र तक ना जाने कितने मनीषियों ने भारत को अपने अलौकिक ज्ञान से समृद्ध किया है।‘’ ये बातें यूपी के पूर्व डीजीपी, कानून-व्यवस्था विशेषज्ञ और प्रेरक वक्ता डॉ. विक्रम सिंह ने ‘’दिव्यांगता और सिनेमारू विविध आयाम’’ के ऑनलाइन लोकार्पण समारोह में कही। कार्यक्रम में पांच यूनिवर्सिटी के नेतृत्वकर्ता-कुलपतियों के अलावा दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्स और देश के कई प्रतिष्ठित लेखक मौजूद थे। इस मौके पर डॉ. विक्रम सिंह ने पुस्तक की संपादक डॉ. चित्रा सिंह को बधाई देते हुए कहा कि उनके डीएनए में बिहार का पर्यावरण है, उन्होंने दिव्यांगों की पीड़ा का अनुभव किया और फिर इस पुस्तक की परिकल्पना की और उसे साकार किया। प्रो. विक्रम सिंह ने कहा कि जब स्वाधिष्ठान चक्र जागृत होता है और आधी चेतना परमात्मा और आधी चेतना संसार से जुड़ी होती तभी व्यक्ति संसार के जनसामान्य की पीड़ा का अहसास कर पाता है।

डॉ. विक्रम सिंह के मुताबिक अगर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने स्वयं पीड़ा ना देखी होती तो वो ‘सरोज स्मृति’ नहीं लिख पाते। उन्होंने ‘दोस्ती’, ‘वैराग्य’ और ‘तारे जमीन पर’ जैसी फिल्मों का जिक्र करते हुए कहा कि इन फिल्मों ने अलग-अलग तरीके से दिव्यांगता को चित्रित किया। डॉ. सिंह ने महान अभिनेता दिलीप कुमार से अपनी पुरानी बातचीत को याद करते हुए कहा कि एक बार जब उन्होंने दिलाप कुमार से ‘बैराग’ फिल्म में गहन अभिनय का राज पूछा तो दिलीप कुमार ने उन्हें बताया कि वो एक महीने तक दिव्यांग लोगों के बीच रहे थे। इसके अलावा उन्होंने फिल्म अभिनेत्री वहीदा रहमान से भी ‘खामोशी’ फिल्म में बेहतरीन अभिनय के बारे में पूछा तो उन्होंने भी बताया कि स्वयं दिव्यांग लोगों के बीच जाकर उनकी पीड़ा का अनुभव किया, फिर जाकर अभिनय में वो बात आ पाई।

प्रो. विक्रम सिंह ने कहा अगर हमारे भीतर हरा-भरा है तो बाहर भी हरा-भरा अनुभव होगा और अगर हमारे भीतर नागफनी है तो बाहर भी हमें नागफनी ही दिखेगी। जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि। अगर हमारे भीतर का पर्यावरण सूखा हुआ है तो पूरा विश्व मरुस्थल नजर आएगा। उन्होंने जॉन डन की एक कविता का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे भीतर ‘सर्वे भवन्तु सुखिनरू, सर्वे संतु निरामया’ की भावना होनी चाहिए।

कार्यक्रम का संचालन कर रहे दिल्ली यूनिवर्सिटी के भीमराव अंबेडकर कॉलेज के हिंदी के असोसिएट प्रोफेसर, लेखक- अंतरराष्ट्रीय चिंतक डॉ. राम प्रकाश द्विवेदी ने डॉ. विक्रम सिंह ने कहा कि डॉ. विक्रम सिंह के वक्तव्य हमारे लिए प्रेरणादायी है। उन्होंने डॉ. विक्रम सिंह को एक पर्यावरणविद् के तौर पर याद करते हुए कहा कि उनका योगदान प्रकृति और देश-समाज के लिए बेहद विशिष्ट है। वहीं माखनलाल चतुर्वेदी के कुलपति और प्रख्यात मीडिया शिक्षाविद् प्रो. केजी सुरेश ने भी डॉ. विक्रम सिंह के संबोधन को बेहद अर्थपूर्ण बताया। चैधरी देवीलाल यूनिवर्सिटी और चैधरी रणवीर सिंह यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. आरबी सोलंकी के मुताबिक डॉ. विक्रम सिंह का वक्तव्य समाज के लिए प्रेरणास्त्रोत की तरह है। अपने वक्तृत्व कला से सभी को सम्मोहित कर लेने वाले डॉ. विक्रम सर के भाषण का जिक्र करते हुए इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सत्यकाम ने कहा कि प्रो. विक्रम सिंह ने जिस विस्तार, विद्वता और शाश्वतता के साथ दिव्यांगता को परिभाषित किया, वो अद्भुत था। उनके मुताबकि एक अधिकारी होते हुए अलग-अलग क्षेत्रों में उच्च स्तर की विद्वता रखना वाकई काबिलेतारीफ है। कार्यक्रम के अंत में दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रो. मंजू ऐलाबादी ने वक्ताओं का धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कि ये कार्यक्रम अपनी अनूठी चर्चा के लिए याद किया जाएगा। एक संवेदनशील विषय पर बेहद ज्ञानपरक-रुचिकर विषय पर चर्चा और पुस्तक के लोकार्पण कार्यक्रम का संयोजन स्टार न्यूज और एबीपी न्यूज के पूर्व असोसिएट प्रोड्यूसर और नोएडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर आदर्श कुमार ने किया था।

Load More Related Articles
Load More By admin
Load More In खबरें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

Gift your Loved Ones a hamper from HealthNJig to keep them safe this festive season

Every time a festive season is approaching us, it demands a special touch. The festive gif…