Home दिल्ली ख़ास कला/साहित्य / संस्कृति आईए जानते हैं लद्दाख के दरद आर्यन के विषय में

आईए जानते हैं लद्दाख के दरद आर्यन के विषय में

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दरद आर्यन उत्सव 16 से 21 जनवरी तक नई दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में मनाया जा रहा है। यही नहीं एक विशेष आयोजन जो 20 जनवरी को प्रयागराज के कुंभ मेले में किया जाएगा, जिसमें आर्य घाटी से आए कलाकारों का एक दल अपनी संस्कृति की प्रस्तुति देगा। यह अवसर आर्य लोगों के लिए महत्वपूर्ण तो है ही, लेकिन समस्त देशवासियों एवं प्रयागराज में आए श्रद्धालुओं के लिए भी विशेष अवसर होगा।

धरती की गोद में फैले विस्तृत हिमालय के क्षेत्र में कई जनजातियों का वास है, जिन्होंने हजारों वर्षों से अपनी संस्कृति को संजो रखा है। इन्हीं घाटियों में से एक है आर्यन घाटी, जो पूरे विश्व में अपनी संस्कृति के लिए जानी जाती है। लेह और कारगिल राज्यों के बीच में, सिंधु नदी के किनारे पर कुछ गांव फैले हुए हैं, जो संसार में कुछ बुरे तो कुछ अच्छे कारणों के लिए प्रसिद्ध हैं। इस क्षेत्र की जनजातियों की विशिष्टता के ऊपर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, जिसके लिए इन जनजातियों को दुनिया में एक विशिष्ट जनजातियों में शामिल करने का विचार किया गया। कुछ विद्वानों ने इन जनजातीय समुदायों को आर्यन लोगों में शामिल करने की कोशिश की, तो कुछ ने इनको एलेग्जेंडर का वंशज माना। बहरहाल, उनकी जो भी जातीयता है, ये तो सत्य है कि ये लोग उन समुदायों से कुछ हद तक अलग हैं, जो कि पहले से ही लद्दाख के शीत मरुस्थलीय जगहों पर निवास कर रहे हैं। आइए जानते हैं और देखते हैं उनकी रंगी-बिरंगी संस्कृति और गायन के कुछ विविध रूपों को।

जनजातीय समुदायों में हम देखते हैं कि उनका पूरा इतिहास मौखिक तौर पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रेषित किया गया है। प्राथमिक तौर पर पहले से ही कुछ मजबूरियों की वजह से स्थानांतरण हुए हैं और परिणामस्वरूप नस्लीय बातचीत के कारण आपत्तिजनक स्थितियां उत्पन्न हो गईं, जिन्होंने आगे चलकर इनकी उत्पत्ति को और पेचीदा बना दिया। दर्दों के मामले में जो कि लद्दाख में रह रहे हैं और कुछ गाँवों तक ही सीमित हैं और उनकी अपनी एक विशिष्ट जीवन शैली है जो कि इन सभी विचारों के अधीन है। इनकी उत्पत्ति पर और दूसरे पड़ौसी समुदायों / जगहों से आत्मीयता से सम्बंधित अब तक कोई गंभीर वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया गया है। कुछ विशिष्ट विशेषताएं हैं जो कि इनको अपने द्रष्टिकोण और चरित्र से कुछ अलग बनाती हैं।

आइए जानते हैं, वो क्या विशेषताएं हैं-

1. आदमी और औरतें, दोनों ही अति सुन्दर वेशभूषायें और आभूषण पहनते हैं। सर पर पहनने वाला साफा फूलों से सुशोभित होता है।
2. यह लोग गाय व मुर्गी पालन से घृणा करते हैं। गौ मांस प्रतिबंधित है। यह लोग केवल बकरी व भेड़ का दूध ही ग्रहण करते हैं।
3. दरद घोड़ों को पालते हैं, जिसे वे माल – परिवहन के लिए प्रयोग करते हैं।
4. उनकी भाषा के 50 प्रतिशत से अधिक शब्दों की उत्पत्ति संस्कृत भाषा से हुई है।
5. सभी घरों कि रसोइयों में “सबदक” कि पूजा-अर्चना की जाती है जो कि एक प्रकार का लिंग है। यह लोग हर दिन सबदक के समक्ष दिन का बना पहला भोजन अर्पित करते हैं। सबदक त्रिकोणीय आकार में है।
6. कुछ समय पहले तक बहुपतित्व का पालन किया जाता था और उनमें पत्नियों कि अदला-बदली वाली प्रथा का भी प्रचलन था।
7. सार्वजनिक भावुक चुम्बन भी इस जनजाति में प्रसिद्ध है।
8. यहां के वासी फूलों से अत्याधिक प्रेम करते हैं और अपने शीर्ष को फूलों से सजाते हैं। यह फूल वह अपने घर के आस-पास लगाते हैं और देवताओं की पूजा भी फूलों से करते हैं। इन फूलों में एक विशेष फूल जिसका यहां की भाषा में
मंटु टो कहते हैं, यह फूल 12 वर्षों तक मुरझाए बिना ताजा रहता है, इस फूल को देवताओं को समर्पित किया जाता है और अपने शीर्ष पर सजाया जाता है।
9. यहां के प्रमुख देवताओं में नारायण देवता और इंद्र देवता है ।

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