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कौन बचाएगा मानवाधिकार को? विश्व मानवाधिकार दिवस, 10 दिसम्बर 2017 पर विशेष ---ललित गर्ग

बात पेट जितनी पुरानी और भूख जितनी नई है ”मानवाधिकार“ की। दुनिया में जहां-जहां भी संघर्ष चल रहे हैं, चाहे सत्ता परिवर्तन के लिए हैं, चाहे अधिकारों को प्राप्त करने के लिए, चाहे जाति, धर्म और रंग के लिए वहां-वहां मानवाधिकारों की बात उठाई जाती रही है। हमारे देश में भी वक्त चाहे राजशाही का था, चाहे विदेशी हुकूमत का और चाहे स्वदेशी सरकार का हर समय किसी न किसी हिस्से में संघर्ष चलते रहते हैं। सवा सौ करोड़ के देश मंे विचार फर्क और मांगांे की लंबी सूची का होना स्वाभाविक है।

कानून और व्यवस्था का सीधा दायित्व पुलिस विभाग पर रहता है। उन्हें ही ऐसे आन्दोलनों से निपटना होता है। साधारण अपराध में लिप्त व्यक्ति से भी थाने में वे ही निपटते हैं। पुरुषों से तो बात उगलवाने के लिए मारपीट और अकारण बन्द रखने की घटनाएं तो आए दिन सुनने-पढ़ने को मिलती हैं लेकिन अब तो महिलाओं के साथ दुव्र्यवहार की घटनाओं की संख्या भी चैंका देने वाली है। यह बात और है कि अगर किसी महिला के साथ अत्याचार होता है तो उसकी कोई सुनवाई नहीं होती।

रह-रहकर होने वाली भारतीय पुलिस की बर्बरता की घटनाओं की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर गूंज होती रहती है। लेकिन तब यह कहकर कि ”हमें उनके उपदेशों की जरूरत नहीं“ टाल देते हैं। कश्मीर में पुलिस को साधारण अपराधियों से नहीं, राष्ट्रविरोधी तत्वों से निपटना पड़ रहा है। वहां यह बात स्वीकार की जा सकती है कि  जब राष्ट्र की सुरक्षा और मानवाधिकारों के बीच टकराव होता है तो राष्ट्र की सुरक्षा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, परन्तु इस बड़े सिद्धान्त की ओट में कोई खेल नहीं होना चाहिए। कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए। कोई बदले की भावना नहीं होनी चाहिए।

पुलिस इस रूप में पूर्ण प्रशिक्षित नहीं है। मानवीय संवेदना का उसमें अभाव रहता आया है और रहता है। पर यह स्थिति हमेशा के लिए नहीं बनी रहनी चाहिए। इस समस्या के लिए पुलिस का नागरिकीकरण हो। नागरिक समिति का एक सुदृढ़ आधार बनाया जाए। पुलिस को विशेष प्रशिक्षण दिया जाए। दूसरा सुधारवादी कदम यह हो कि पुलिस के बड़े-बड़े अधिकारियों की बैठकों में निम्न स्तर के तरीकों पर पुनर्विचार हो। उनके अधिकारों का पुनरावलोकन हो।

पुलिस हिरासत में मरने वाले अधिकांश गरीब होते हैं जिनकी कोई पैरवी करने वाला नहीं होता। पुलिस उन पर बेवजह अत्याचार करती है। मारती है और मौत को दबा दिया जाता है। इसलिए उपर्युक्त समितियों के द्वारा बिना गिरफ्तार किए लोगों के बारे में भी जांच का प्रावधान रखा जाना चाहिए।

बात केवल पुलिस की बर्बरता की नहीं है, अनेक हालातों एवं क्षेत्रों में पुलिस भी स्वयं बेबस होती है। हमारा संविधान भी हमें मूलभूत अधिकारों से परिपूर्ण करता है, लेकिन मानव अधिकारों के हनन में भी हमारा देश पीछे नहीं है। आजादी के इतने सालों बाद भी बंधुआ मजदूरी को पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सका है। बाल मजदूरी जो एक मासूम की जिंदगी के साथ खिलवाड़ है, वह भी खुलेआम  होता है। गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी आज भी मुंह बाए खड़ी हैं। रोटी, कपड़ा और मकान जो लोगों की मूलभूत आवश्यकताएँ हैं वे भी हमारी सरकार पूरी नहीं कर पा रही हंै। शिक्षा का अधिकार, भोजन का अधिकार, रोजगार का अधिकार, स्वच्छ जीवन का अधिकार- ये सभी बुनियादी अधिकारों का हनन होना आज के तिथि में एक घिनौना पाप है, त्रासदी है, विडम्बना है।

अगर आज भी हमारे देश के लोगों को जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर, संप्रदाय के नाम पर, भाषा के नाम पर, क्षेत्र के नाम पर भेदभाव का शिकार होना पड़ता है तो लानत है इस देश के लोगों पर और यहाँ की सरकार पर। सरकारें यदि ईमानदारी से प्रयत्न करती तो इन समस्याओं को सालों पूर्व खत्म कर सकती थी लेकिन नहीं, सरकार और सरकार में

संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा घोषित दिवसों में एक महत्वपूर्ण दिवस है विश्व मानवाधिकार दिवस। प्रत्येक वर्ष 10 दिसम्बर को यह दिवस दुनियाभर में मनाया जाता है। इस महत्त्वपूर्ण दिवस की नींव विश्व युद्ध की विभीषिका से झुलस रहे लोगों के दर्द को समझ कर और उसको महसूस कर रखी गई थी। यह दिवस मानव के अस्तित्व एवं अस्मिता को अक्षुण्ण रखने के संकल्प को बल देता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने 10 दिसम्बर, 1948 को सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणापत्र को अधिकारिक मान्यता प्रदान की थी। तब से यह दिन इसी नाम से मनाया जाने लगा। किसी भी इंसान की जिंदगी, आजादी, बराबरी और सम्मान का अधिकार है- मानवाधिकार। यह दिवस एक मील का पत्थर है, जिसमें समृद्धि, प्रतिष्ठा व शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के प्रति मानव की आकांक्षा प्रतिबिंबित होती है।

भारतीय संविधान इस अधिकार की न सिर्फ गारंटी देता है, बल्कि इसे तोड़ने वाले के लिये कठोर सजा का प्रावधान किया गया है। भारत में 28 सितंबर, 1993 से मानव अधिकार कानून अमल में आया। 12 अक्टूबर, 1993 में सरकार ने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन किया। आयोग के कार्यक्षेत्र में नागरिक और राजनीतिक के साथ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार भी आते हैं, जैसे- बाल मजदूरी, एचआईवी, एड्स, स्वास्थ्य, भोजन, बाल विवाह, महिला अधिकार, हिरासत और मुठभेड़ में होने वाली मौत, अल्पसंख्यकों और अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकार आदि।

विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र का मुख्य विषय शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगारी, आवास, संस्कृति, खाद्यान्न व मनोरंजन से जुड़ी मानव की बुनियादी मांगों से संबंधित है। विश्व के बहुत से क्षेत्र गरीबी से पीड़ित है, जो बड़ी संख्या वाले लोगों के प्रति बुनियादी मानवाधिकार प्राप्त करने की सबसे बड़ी बाधा है। उन क्षेत्रों में बच्चे, वरिष्ठ नागरिकों व महिलाओं के बुनियादी हितों को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। इसके अलावा नस्लवाद भेद मानवाधिकार कार्य के विकास को बड़ी चुनौती दे रहा है। इसी तरह आदिवासी एवं दलितों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार भी मानवाधिकार का बड़ा मुद्दा है। महिलाओं, बच्चों एवं वृद्धों की उपेक्षा एवं प्रताड़नाएं भी मानवाधिकार के सम्मुख बड़े संकट हैं।

माक्र्सवादी अवधारणा केवल संविधान में उल्लिखित नागरिक अधिकारों की व्याख्या करने में विश्वास नहीं रखती वरन् उनका प्रयोग किस प्रकार से किया जाए उसमें विश्वास करती है। स्टालिन के शब्दों में- ‘एक भूखे और बेरोजगार के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता का कोई महत्त्व नहीं है। सच्ची स्वतंत्रता वही है-जहाँ शोषण, बेरोजगारी, भिक्षावृत्ति अथवा कल के लिए चिंता की समस्या नहीं है।’

युद्ध हमेशा मानवता के खिलाफ होता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान मानव व्यक्तित्व और मानवाधिकार का जो उल्लंघन हुआ था, उसने संपूर्ण विश्व के शांतिवादियों को आन्दोलित कर दिया और यह सर्वत्र अनुभव किया जाने लगा कि यदि मानव के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया, तो मानवाधिकार महज एक मजाक बनकर रह जाएगा। मानवाधिकार दिवस एक प्रेरणा है, एक संकल्प है मानव को सम्मानजनक, सुरक्षित, सुशिक्षित एवं भयमुक्त जीवन का। जीवन के चैराहे पर खड़े होकर कोई यह सोचे कि मैं सबके लिये क्यों जीऊं? तो यह स्वार्थ-चेतना मानवाधिकार की सबसे बड़ी बाधा है। हम सबके लिये जीयें तो फिर न युद्ध का भय होगा, न असुरक्षा की आशंका, न अविश्वास, न हिंसा, न शोषण, न संग्रह, न शत्रुता का भाव, न किसी को नीचा दिखाने की कोशिश, न किसी की अस्मिता को लूटने का प्रयत्न। मानव जीवन के मूलभूत अधिकारों का हनन को रोकना एवं सारेे निषेधात्मक भावों की अस्वीकृति का निर्माण ही नया मानव जीवन निर्मित कर सकेंगे और यही मानवाधिकार दिवस की सार्थकता होगी।

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