बच्चों में ख़ास तौर पर जान बचाने में सीपीआर की अवधी होती है अह्म

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  • हस्पताल में कार्डियक अरेस्ट वाले मरीज़ों के लिए ज़्यादा अवधी की कार्डियोप्लमनरी रिससिटेशन हो सकती है फायदेमंद

अक्समाक कार्डियक अरेस्ट हर साल भारत में 1 लाख में से 4280 जानें ले लेता है। मेडिकल की अनेक आधुनिक सुविधाओं के बावजूद बचने की दर 5 से 10 प्रतिशत ही है।

सीपीआर की अवधि और हस्पताल में कार्डियक अरेस्ट के बाद जान बचने की संभावना के संबंध की जांच करने के लिए एक अध्ययन में अमेरीकन हार्ट एसोसिएशन की गैट द गाईडलाइन्स-रिससिटेशन रजिस्टरी का प्रयोग किया गया।

अध्ययन में शामिल 3419 बच्चें में से 28 प्रतिशत बच्चों की जान बच गई और इनमें से 16.6 प्रतिशत को 35 मिनट से ज़्यादा सीपीआर दिया गया। बचने वाले कुल बच्चों में से 60 प्रतिशत जिन्हें लंबी अवधि तक सीपीआर दिया गया उन्हें काफी बेहतर न्यूारेलाॅजिकल लाभ हुआ, इस बात की जानकारी अमेरीकन हार्ट एसोसिएशन की शोध पत्रिका सर्कुलेशन में छापी गई है। बचने वालों के अध्ययन में न्यूरोलोजिकल नतीजे ज़्यादातर लोगों में सकारात्मक पाए गए।

इस बारे में जानकारी आईएमए के नैशनल प्रेसीडेंट एंव एचसीएफआई के प्रेसीडेंट पद्मश्री डॉ केके अग्रवाल और आईएमए के जनरल सेक्रेटरी डाॅ आरएन टंडन कहते हैं कि लगातार दबाव वाली सीपीआर के दौरान दिल स्ट्रनम और पीठ की हड्डियों में दब जाता है और इससे पीड़ित के दिमाग को आक्सीजन वाले रक्त की आपूर्ति होती रहती है। यह प्रक्रिया तब तक पीड़ित को ज़िंदा रखती है जब तक माहिर मेडिकल सहायता प्राप्त नहीं हो जाती। कार्डियक अरेस्ट को पीड़ित को जितनी जल्दी सीपीआर दी जाएगी उसके बचने की संभावना उतनी ज़्यादा बढ़ जाएगी। 1990वें दशक के मध्य में अधिकारी बच्चों को बीस मिनट से ज़्यादा या एपिनेफराईन की दो से ज़्यादा ख़ुराक देने के बाद सीपीआर देना व्यर्थ मानते थे। वैसे तो लंबी अवधी तक सीपीआर देना किसी बच्चे के लिए फायदेमंद हो सकती है, लेकिन सच्चाई यही है कि पहले 15 मिनट के बाद बचने की संभावना काफी कम होने लगती है। पंद्रह मिनट तक छाती दबाने के बाद हर मिनट के बाद बचने की संभावना 2.1 प्रतिशत कम हो जाती है।

अध्ययन के अंकड़ों के मुताबिक जब सर्जिकल कार्डियक श्रेणी के पीड़ितों को सीपीआर 35 मिनट से ज़्यादा दी गई थी तो हस्पताल से ठीक होकर जाने वालों की दर 25 प्रतिशत थी, उसके बाद मेडिकल कार्डियक वालों की दर 21 प्रतिशत; जनरल सर्जिकल की 13 प्रतिशत; जनरल मेडिकल की 10 प्रतिशत और ट्रामा की 8 प्रतिशत।

डाॅ अग्रवाल कहते हैं कि पहले के कई अध्ययनों ने सीपीआर की अवधी और बचने की संभावना के संबंध के बारे में हो चुके हैं। लेकिन अभी तक प्रर्याप्त प्रमाण प्राप्त नहीं हो सके जो हस्पताल में सीपीआर देने की निम्नतम अवधि तैय कर सकें। इसकी बजाए हर केस में सीपीआर की अवधि उस की स्थिति के अनुसार ही तैय होनी चाहिए। इसके साथ ही जान बचाने के लिए कारगर अन्य कारणों को भी ध्यान में रखना चाहिए। मेरी डाॅक्टरों को यही सलाह होगी।

तुरंत सीपीआर देने के साथ ही रेपिड डिफिब्रिलेशन और 1-2 एमजी एपाईफ्राईन के अलावा किसी भी किस्म के इलाज ने तुंरत रक्त बहाव ठीक होते नहीं पाया गया है। हाल ही में एपाईनफ्राईन के लंबी अवधि के फायदों पर भी सवाल उठे थे। बचने वाले लोगों में न्यूरोलाॅजिकल नतीजे सकारात्मक थे। कुछ मरीज़ों की प्रतिस्थिति में 20 मिनट से ज़्यादा सीपीआर देना व्यर्थ नहीं होता।

हार्ट केयर फाउंडेशन का हैंडस ओनली सीपीआर 10 मंत्र है, दस मिनट के अंदर कम से कम 10 मिनट तक व्यस्को को 25 और बच्चों को 35 मिनट तक सीने के बीचों-बीच 10 गुना 10 प्रति 1 मिनट में सौ बार लगातार कारगर तरीके से दबाते रहें।

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